‘देख ननकू, अभी ठीक सवा छह बजे हैं, अगर आपको मेरे साथ चलना है तो अभी उठना होगा।’ ‘यह बात आपने मुझे कल रात को ही बता दी थी। अब आप पांच मिनट का समय दें। मैं अपने आप उठ जाऊंगी।’ यह संवाद मेरे और मेरी बिटिया के बीच चल रहा है। कल रात बिटिया ने कहा था कि उसे दक्षिण दिल्ली की तरफ कुछ काम है, इसलिए वह मेरे साथ जाना चाहेगी। बस उसी के लिए मैं उसे जगा रही थी कि कहीं उसके फेर में मुझे देर न हो जाए।

पांच मिनट का समय मांगा तो इतना धैर्य मुझे रखना ही था। मैं अपने काम में व्यस्त हो गई इस विश्वास के साथ कि पांच मिनट बाद उठ जाएगी। पांच के दस, दस के पंद्रह मिनट बीते तो माथा ठनका, क्योंकि किसी भी तरह की आवाज नहीं आ रही थी। घबराई-सी मैं बिटिया के कमरे में गई तो देखा अलसाई-सी बैठी है। फिर मैंने कहा ‘ओ यार जल्दी कर न!’ ऐसा कह कर बिना उसकी प्रतिक्रिया जाने अपने काम में जुट गई। शायद पल, दो पल भी न बीते होंगे कि मैं बोल पड़ी, ‘ननकू जल्दी कर लेना।’

नियत समय पर हम दोनों गाड़ी में सवार थे। कुछ समय पहले मुझ पर छाई हड़बड़ी अब तसल्ली महसूस कर रही थी। मैंने अपने साथ बैठी बिटिया के चेहरे पर नजर डाली। उसने मुस्करा कर कहा, ‘मां जरा दो मिनट के लिए आंख तो बंद करो और सोचो कि सुबह से लेकर अब तक आपने कितनी बार ये वाक्य बोला होगा- जल्दी कर लेना।’ क्या हमारे ‘जल्दी-जल्दी’ कहने भर से बच्चे जल्दी करते हैं या फिर हमारी बेबसी पर तरस खाते हैं या फिर चिढ़ जाते हैं? आज की पीढ़ी जो भी करती हो, मैंने सोचा नहीं, पर मुझे यह मालूम है कि जब मेरी मां कभी एक से अधिक बार इस तरह की बात कहती तो मैं भुनभुना उठती थी और जानबूझ कर देरी करती थी।

मैं क्यों नहीं याद रख पाई कि जो मुझे पसंद नहीं था वह मेरे बच्चों को कैसे ठीक लग सकता है? यह बात तो रही एक तरफ, दूसरी बात देखिए कि मैं तो चिढ़ उठती थी और आज की पीढ़ी को देखिए कि मेरी ज्यादती को सहन कर, सहज भाव से मेरी गलती का मुझे अहसास करा दिया!
शारदा कुमारी, द्वारका, नई दिल्ली

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