प्रकृति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक उपहार इंसान को प्राप्त है, कला। ‘कला’ को बखूबी संजोए रखने का काम साहित्य करता है। किसी भी संस्कृति में कला और साहित्य का स्थान सर्वोपरि होता है। आज के समय में इसकी कमी युवाओं में साफ झलकती है, वे इस प्रतिस्पर्धात्मक सामाजिक दौर में उस घोड़े की तरह दौड़ लगाने को बेताब हैं, जिसे मंजिल का आभास तक नहीं है। दिन पर दिन युवाओं का रुझान इस क्षेत्र से ओझल-सा होता दिख रहा है। अगर यही स्थिति बरकरार रही तो हमारा मौलिक चिंतन पतन की ओर अग्रसर होता चला जाएगा!

क्षेत्र चाहे राजनीति का हो, विज्ञान का हो या कोई और, कला की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। कला उस आभूषण की तरह है, जो सिर्फ इंसान के सुंदरता को ही नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व को निखारती है। संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प, चित्र-कला, नाट्य-कला आदि के बिना जीवन जीना काफी कठिन नजर आता है। बचपन में मिट््टी के बने खिलौनों से लेकर बुढ़ापे में लिखे गए किसी उपन्यास में कला का भरपूर समावेश रहता है।

अनेक विविधताओं के बावजूद कला हमें एक सूत्र में बांधे रखने का काम करती है। टेक्नोलॉजी की होड़ में अगर हम कला से दूर हो गए तो हमारी रचनात्मकता, सृजनात्मकता, कलात्मकता सब खत्म होने में अधिक समय नहीं लगेगा।
अभिषेक दुबे, दादरा एवं नगर हवेली

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