धन्यवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी यह बताने के लिए कि प्रख्यात साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर ‘भूमिहार’ थे। वरना मैं तो उन्हें एक बड़े कवि और साहित्यकार के रूप में ही जानता था। हां, सुन यह भी रखा था कि लेखक या साहित्यकार की कोई जाति नहीं होती। वह जातिविहीन होता है। लेकिन राजनीति करने वाले शायद ऐसा नहीं मानते। उनके लिए जाति-धर्म-संप्रदाय पहले हैं, बाकी चीजें बाद में!
प्रधानमंत्री का रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को याद करना अकारण नहीं, उसका सीधा-सच्चा कारण कुछ माह बाद बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं। दिनकर क्योंकि भूमिहार थे इस बहाने क्यों न भूमिहार वोट बैंक को ही मजबूत किया जाए! भाजपा को बिहार की राजनीति में अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए कोई ‘आधार’ तो चाहिए ही, फिर दिनकर से बेहतर भला क्या होगा? एक बड़े साहित्यकार-कवि की कालजयी रचनाओं के बहाने ही सही, अगर किसी प्रकार की लाभप्रद राजनीति सधती है तो क्यों चूका जाए! मौका देखकर चौका मारना राजनेताओं की दशकों पुराना आदत रही है।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ लिखते वक्त शायद दिनकर ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके लिखे ‘संस्कृति’ शब्द को किसी दूसरे तरीके से लिया-समझा जाएगा। भाजपा उनके संस्कृति शब्द को अपने हिसाब से लपक लेगी। जैसे पिछले दिनों डॉ आंबेडकर के जाति-विरोधी अभियान को नए-नए तरीकों से ‘हाईजैक’ करने की कोशिशें की गई थीं। एकाएक भाजपा का डॉ आंबेडकर के प्रति ऐसा प्रेम उमड़ा कि उसे अपने तरीके से उन्हें याद करना पड़ा। गजब देखिए, डॉ आंबेडकर के लिखे पर बात कम हुई, यहां भी जाति-व्यवस्था ही ज्यादा हावी रही।
प्रधानमंत्री ने कहा- 1962 की हार के बाद दिनकर को ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ थी। कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री उस परशुराम में अपनी पार्टी की जीत का अक्स तलाश रहे हों। लगे हाथ मंच से दिनकर को भारत रत्न देने की मांग भी उठी। लेकिन अभी क्यों? दिनकर को भारत रत्न देने का खयाल पहले क्यों नहीं आया? क्या किसी बड़े साहित्यकार या कवि की पहचान तभी होगी जब उसे कोई बहुत बड़ा सम्मान दिया जाएगा? क्या उसकी रचनाएं काफी नहीं लोगों के भीतर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए। आज राजनीति के तहत दिनकर को भारत रत्न देने की मांग उठी है, हो सकता है, कल यह प्रेमचंद के लिए भी उठ जाए। यों भी, हर सम्मान-पुरस्कार के पीछे कितनी राजनीति छिपी होती है, हम सब बहुत अच्छे से जानते हैं।
एक बड़े कवि-साहित्यकार को राजनीति-चुनाव का आधार बनाना और इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा करके सरकार न केवल साहित्यकार बल्कि इतिहास के साथ भी अन्याय कर रही है। पहले डॉ आंबेडकर, अब दिनकर। आगे कौन होगा बस देखते जाइए क्योंकि हमारी सरकार किसी भी सूरत में ‘अच्छे दिन’ लाने को प्रतिबद्ध जो है।
अंशुमाली रस्तोगी, बरेली
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