एक साल के भीतर मोदी सरकार देश में कितने अच्छे दिन कहां-कहां ला पाई है शायद बताने की जरूरत नहीं। हालांकि एक साल में पाई उपलब्धियों (?) के चर्चे खूब हैं पर जमीनी हकीकत क्या है, इसे किसानों के निरंतर आत्महत्या करने और प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के हासिल से बखूबी समझा जा सकता है। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से भारत के दूसरे देशों के साथ संबंध भिन्न-भिन्न स्तर पर मजबूत हुए हैं या होंगे! लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, देश के हालात को देखना। उसमें भी किसानों के। लेकिन इसका जिक्र सरकार का कोई मंत्री नहीं करना चाहता।
अगर देश में वाकई अच्छे दिन आ गए हैं तो फिर किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? यह सच है कि बारिश और मौसम ने किसान की कमर तोड़ दी है मगर उसे बचाने के लिए सरकार तो है न। चुनावों के दौरान नेताओं ने वोट किसानों और गरीबों की बेहतरी के लिए ही मांगे थे मगर चुनाव निपटते ही सारे वायदे हवा-हवाई हुए। केंद्र में अच्छे दिन की सरकार होने के बाद भी किसानों का आत्महत्या करना बताता है कि खामियां कितनी और कहां-कहां हैं।
यह सही है कि सब कुछ केवल एक रात में दुरुस्त नहीं हो सकता। पर दुरुस्त करने के प्रयास तो किए जा सकते हैं। मगर प्रयास किसानों की बेहतरी के लिए कम और बेतुके और सांप्रदायिक बयान देने के लिए अधिक हो रहे हैं। जिस नेता के मन में जो आ रहा है, बोल रहा है। सारे कायदे-कानून को एक तरफ रख कर बोल रहा है। इस वक्त देश और समाज की मजबूती के लिए किसानों की आत्महत्या को रोकना जरूरी है या बयानबाजी करना, सरकार और प्रधानमंत्री स्पष्ट करें।
दुख तब और ज्यादा होता है, जब हमारे वामपंथी दल सब कुछ होता हुआ चुपचाप देखते रहते हैं। अगर उनकी प्रतिक्रियाएं आती भी हैं तो इतनी खामोशी के साथ कि शायद उनके दल के सदस्यों को भी पता नहीं रहता होगा कि किसने, कब, क्या कहा? पता नहीं वाम दलों को हो क्या गया है? इस हद तक मौन रहते हैं मानो उन्हें कुछ खबर ही न हो। साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी अजीब-सी चुप्पी बनी हुई है।
सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए जो विपक्ष बचा है, उसका कोई मतलब नहीं। राहुल गांधी संसद में दो-चार मजाकिया जुमले सुना कर समझते हैं कि उन्होंने सरकार या प्रधानमंत्री को घेर लिया है। यह उनकी और कांग्रेस पार्टी की खुशफहमी हो सकती है। जब वे स्वयं सरकार थे तब उन्होंने कितने किसानों को आत्महत्या करने से रोका था? दरअसल, सत्ता का दामन थामते ही राजनीतिक दल और नेताओं के चेहरे एकदम बदल जाते हैं।
बेशक देश को विकास की जरूरत है मगर जो किसान इस विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता चला आ रहा है, उसे ही किनारे करके क्या यह संभव होगा? चीन, मंगोलिया, कोरिया के साथ सांस्कृतिक, तकनीकी या सामरिक समझौते कर लेने भर से किसानों का भला होने वाला नहीं प्रधानमंत्रीजी। देश का किसान आज भी वहीं है, जहां कल था। हां, अब उसने परेशान होकर आत्महत्या करना और सीख लिया है।
अभी सरकार को एक ही साल हुआ है आगे के चार साल कैसे गुजरेंगे, यह वक्त बताएगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि प्रधानमंत्री कितने दिन देश और कितने दिन विदेश में गुजारते हैं।
अंशुमाली रस्तोगी, बरेली
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