प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश में जहां-जहां भी गए और उन देशों में रह रहे भारतवासियों से जहां-जहां भी मुखातिब हुए, वहां उन्होंने हिंदी में भाषण दिए जिन्हें श्रोताओं ने न केवल अभिभूत होकर सुना बल्कि उन्हें मंत्रमुग्ध भी कर दिया। मित्रों का कहना है कि मोदीजी को अंगरेजी में दक्षता हासिल नहीं है इसलिए हिंदी में भाषण देना उनकी मजबूरी है। बिलकुल ठीक। वैसे ही जैसे हिंदी पर जिसका अधिकार नहीं है, अंगरेजी में बोलना उसकी मजबूरी बन जाता है।
हां, एक बात अवश्य है कि भावना/ संवेदना के स्तर पर जिस आत्मीयता और राष्ट्रीय गौरव का अहसास कराते हुए हिंदी भाषा एक प्रवासी/ भारतीय के संस्कारों के साथ सहसा ही जुड़ जाती है और उसका सहज प्रवाह जैसे दर्शक अथवा श्रोता को प्रभावित करता है, वैसा सहज प्रभाव विदेशी भाषा अंगरेजी में कहां?
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर
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