बेशक नरेंद्र मोदी सरकार का एक साल अनेक उपलब्धियों से भरा हुआ है जिसकी प्रस्तुति और मार्केटिंग वे शानदार तरीके से कर भी रहे हैं। अधिकांश तथ्य और आंकड़े भी उनकी बात का समर्थन करते नजर आते हैं। लेकिन जैसे बैंड-बाजे के शोर में दुल्हन की सिसकियां दबी रह जाती हैं वैसे ही ‘कामयाबी’ के इस जश्न में कुछ प्रश्न मुंह बाए खड़े हैं और जवाब भी मांग रहे हैं। जैसे विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री देवानंद की तरह आत्ममुग्धता के शिकार होकर हर फ्रेम में खुद की तस्वीर देखते नजर आते हैं। दौरे विदेश के हैं पर विदेश मंत्री साथ नहीं हैं; उधर वे फ्रांस से लड़ाकू जहाजों का सौदा कर रहे हैं मगर रक्षामंत्री साथ नहीं हैं!
चुनाव से पहले और इस पूरे साल में पार्टी ने बुजुर्गों को जिस तरह नेपथ्य में खड़ा कर दिया है उसका क्या जवाब है? बंगलुरू की बैठक में वक्ताओं की सूची से आडवाणीजी का नाम हटा कर मार्गदर्शक से सिर्फ दर्शक बना देना क्या दर्शाता है? सतहत्तर वर्षीय जसवंतसिंह की न कोई खोज, न खबर! पिछली सरकार की ‘नाकामियों’ का विदेश में रोना रोकर और अपने भारतीय होने पर ‘शर्मिंदगी’ की बात भले ही किसी भी परिप्रेक्ष्य में कही गई हो, अपनी किरकिरी ही करवाई है। आत्महत्या करते किसानों के देश का प्रधानमंत्री दूसरे देश को लाखों डॉलर की सहायता की बात करे तो ‘अम्मा चली भुनाने’ वाली कहावत याद करने के अलावा हम क्या कर सकते हैं!
इधर मोदीजी ‘सबके विकास’ की बात करते हैं और उधर कभी उनका पार्टी अध्यक्ष चुनाव में ‘बदला लेने’ की बात कहता है, कोई उनको वोट न देने वालों को पाकिस्तान भेजने की ‘मधुर’ धौंस देता है। साथियों का एक समुदाय विशेष के प्रति ‘प्रेम’ कभी-कभी इतना ज्यादा जोर मारने लगता है कि कोई उनसे सांख्य बल में आगे रहने के लिए चार, तो कोई दस बच्चे पैदा करने का फरमान जारी कर देता है। और इस नहले पर दहला मारते हुए कोई उस समुदाय का मतदान का अधिकार छीन लेने की ही वकालत कर बैठता है। क्या नरेंद्र मोदी का यहां खुद चुप बैठे रहना भर ‘सेक्युलर’ कहलाने के लिए पर्याप्त है?
यही हाल मनमोहन सिंह का था जब वे कनिमोड़ी, राजा और कलमाड़ी के कामों के लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार होते हुए भी खुद को ईमानदार और पाक-साफ बताते आ रहे हैं। यानी इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह और मोदी दोनों एक जैसे हैं। सच तो यह है कि मोदीजी की पार्टी के बद्जुबानों ने जो वैचारिक प्रदूषण फैलाया है उसके आगे सारी उपलब्धियां बौनी नजर आती हैं। जब तक अल्पसंख्यक समुदाय का पूर्ण विश्वास हासिल नहीं हो जाता, कोई जश्न मनाना फिजूल है। जब राज्यों और केंद्र में एक ही दल की सरकार हो तो नक्सल समस्या से क्यों नहीं निपटा जा रहा है?
दिल्ली में उपराज्यपाल और केजरीवाल के बीच जो जंग जारी है उसमें कानूनी रूप से केजरीवाल भले ही सही न हों मगर एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार होने के नाते अपनी पसंद के अधिकारी नियुक्त न कर पाने के कारण जनता की सहानुभूति केजरीवाल के पक्ष में बढ़ती जा रही है। केजरीवाल के प्रति सहानुभूति बढ़ने का मतलब अप्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कम होना ही कहा जाएगा। एक बात के लिए सरकार अवश्य प्रशंसा की हकदार है कि अभी तक घोटाले या भ्रष्टाचार का कोई सुर्खियां बटोरने लायक समाचार सामने नहीं आया है।
बहरहाल, जिस तरह मोदीजी ने सक्षम लोगों से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील की और कई लोगों ने उसे मान कर छोड़ा भी, ऐसे ही क्या वे सक्षम लोगों से जातिगत आरक्षण छोड़ने की अपील कर सकते हैं?
ओम वर्मा, रामनगर एक्सटेंशन, देवास
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