पिछले कुछ दिनों से मोदी सरकार सत्ता में अपना एक साल पूरे होने का जश्न मना रही है और स्वयं प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिगण तरह-तरह के विकास के दावे कर रहे हैं। अगर इन छद्म दावों को एक तरफ रखें और मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल को देखें तो ऐसा लगता है कि हमारे देश की संवैधानिक संस्थाओं, संविधान के मूल्यों को लगातार कमजोर किया जा रहा है। विरोध के सारे स्वरों को दबाना ही सत्ता का एकमात्र लक्ष्य बन गया है।
अगर किसान अपने जमीन के हक के लिए विरोध करता है तो उसे विकास विरोधी बताया जा रहा है। अगर अल्पसंख्यकों के मुख से विरोध के स्वर निकलते हैं तो उनसे देशभक्त होने का सर्टिफिकेट मांगा जा रहा है। अगर समाज के दलित और पिछड़े वर्ग से कोई छात्र समूह मोदी सरकार की नीतियों का विरोध और आंबेडकर और पेरियार के विचारों और आदर्शों पर चर्चा करता है तो उस पर यह कह कर प्रतिबंध लगा दिया जाता है कि इससे समाज में वैमनस्य फैलेगा। क्या लव जिहाद, घर वापसी, चर्चों पर हमले, धार्मिक और सामाजिक कटुता जैसे संघ के मूलमंत्रों से देश का विकास किया जाएगा। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसे ही लोकतंत्र की परिकल्पना की थी, जिसमें विरोध या असहमति का कोई स्थान न हो? क्या मोदी सरकार तानाशाही के पथ पर अग्रसर है? क्या यही अच्छे दिन हैं, क्या यही विकास है?
शहाब अहमद, लखनऊ
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