भारत कृषि प्रधान देश है, भारत गांवों में बसता है, खेती का विकास देश का विकास है। गांव, खेती और किसान की महिमा दर्शाने वाले ये जुमले अब तेजी से इतिहास के कथन बनते जा रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है कि अब अच्छे दिन लाने वाले सत्ता में आ गए हैं। आज ‘अच्छे दिनों में’ किसानों के साथ जो सलूक हो रहा है वह तो बुरे से बुरे दिनों में कोई आततायी भी नहीं कर सकता था। यदि कोई किसान के मन की बात जानना चाहे तो उसे यह गाना याद आ जाएगा ‘दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है, जिंदगी भर का गम हमें ईनाम दिया है।’ ग्यारह अप्रैल के अंक में अजेय कुमार का लेख ‘किसानों की फिक्र किसे है’ पढ़ कर अली सरदार जाफरी की रचना ‘आजादी कैसी, किसकी’ आंखों के सामने तैरने लगी जिसमें कहा है कि ‘कौन आजाद हुआ/ किसके माथे से सियाही छूटी/ मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का/ मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही।’

आज किसानों की परेशानियां देखकर महसूस होता है कि अली सरदार जाफरी की रचना ने यह शक्ल अखतियार कर ली है- ‘किसके अच्छे दिन आए/ कौन बर्बाद हुआ/ गांव के सीने में अभी दर्द महकूमी का/ सरकार आजाद है खेती को कुचलने के लिए/ मौत आजाद है लाशों पे गुजरने के लिए/ बालियां धान की गेहूं के सुनहरे गोशे/ मिस्र और यूनान के मजबूर गुलामों की तरह/अजनबी देश के बाजारों में बिक जाते हैं/ और बदबख्त किसानों की तड़पती हुई रूह/ अपने अफलास में मुंह ढांप के सो जाती है/ किसके अच्छे दिन आए/ कौन बर्बाद हुआ?’ अब जरूरी हो गया कि- ‘काली रात की गोद में, चुपचाप न सो जाओ, ज्योति गुम न हो जाए, अंतिम सांस तक लड़ो।’
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

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