देश में इन दिनों विकास का खूब डंका बज रहा है। सरकार दावे पर दावे ठोक रही है, लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही बयां करती है। सामाजिक विकास के वैश्विक सांचे में हम कहीं टिकते नजर नहीं आते। ‘सोशल प्रोग्रेस इम्प्रेटिव’ द्वारा जारी ‘सामाजिक विकास सूचकांक’ (एसपीआइ) में भारत एक सौ एकवें स्थान पर है। इसमें कुल एक सौ तैंतीस देशों के सामाजिक विकास का अध्ययन किया गया था।

गरीब मुल्क जैसे बांग्लादेश और नेपाल इस सूची में भारत से ऊपर हैं। इस शोध के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा, पानी, सैनिटेशन की सुविधा सहित कुल बावन मानक हैं। इसमें नार्वे प्रथम और हमारा सबसे मजबूत साथी अमेरिका सोलहवें स्थान पर है। सही मायने में किसी देश को विकसित तभी कहा जा सकता है, जब वहां के नागरिकों को सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया हों। वहां के अधिकतर नागरिक जीवन से खुश हों।

यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। एक तरफ देश में अरबपतियों की संख्या में वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर मुफ्लिशी वैसे ही मुंह बाए खड़ी है। गरीबों की स्थिति में बदलाव होता नहीं दिख रहा है। वे आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

वैसे भारत में दोहरी व्यवस्था का नजारा लगभग सभी जगह देखने को मिल जाता है। जहां उच्च वर्ग के लिए प्राइवेट शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, पानी सभी की माकूल सुविधाएं हैं, वहीं देश की एक बड़ी आबादी इनकी आस में सरकार की बाट जोह रही है। इन सभी समस्याओं से निजात पाने के लिए सरकार को सामाजिक जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान देना होगा। अन्यथा यह विकास की दुदुंभि बजा कर देश को बरगलाने से ज्यादा कुछ नहीं है।
धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर

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