दिल्ली की राजनीति दो सत्ता केंद्रों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में फंस कर रह गई है। एक तरफ जहां निर्वाचित मुख्यमंत्री होने के नाते अरविंद केजरीवाल अपने अधिकारों के विस्तार की वकालत कर रहे हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली के केंद्र शासित प्रदेश होने का हवाला देकर उपराज्यपाल नजीब जंग सरकार के फैसलों को दरकिनार करने में मशरूफ हैं।

यदि भारत के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो मुख्यमंत्री और राज्यपाल की अदावत कोई नई बात नहीं है। संघीय ढांचे पर प्रहार के मुद्दे कई बार सुर्खियां बटोर चुके हैं। केंद्र और राज्य के संबंध अनेक बार बहस का विषय बनते रहे हैं मगर ताजा शह और मात का खेल जरा अलहदा है। केजरीवाल की महाविजय के साथ ही उनके राज्यपाल से मतभेद जगजाहिर हैं। मगर हाल ही में मुख्य सचिव की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद ने संवैधानिक पदों पर आसीन दो हस्तियों की अदावत को सतह पर ला दिया है।

यदि इस पूरे मामले पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि दिल्ली इस वक्त राजनीतिक और संवैधानिक दोनों ही संकटों से गुजर रही है। प्रश्न है कि क्या जनता द्वारा निर्वाचित मुख्यमंत्री को अपनी पसंद के अधिकारी चुनने का हक नहीं दिया जाना चाहिए? क्या यह पिछले दरवाजे से एक चुनी हुई सरकार को दरकिनार करने का प्रयत्न नहीं है? यदि हम दूसरे पहलू पर गौर करें तो प्रश्न दिल्ली सरकार पर भी उठते हैं। बिना किसी ठोस सबूत के पूर्वोत्तर से आने वाली एक महिला अधिकारी, जो मुख्य सचिव जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर कार्यरत हों, उन्हें सार्वजनिक रूप से भ्रष्ट कहना क्या अफसरों के मनोबल को आघात नहीं पहुंचाएगा? क्या उपराज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था को राजनीति में घसीटना संविधान की मर्यादा की विरुद्ध नहीं है?

इन सवालों से जनता का सरोकार कितना है यह तो वक्त बताएगा मगर इतना तय है कि अनावश्यक प्रतिष्ठा की इस लड़ाई में नुकसान सिर्फ दिल्ली की जनता का है जिसने एक नई राजनीति करने का वादा करने वाली पार्टी को अद्वितीय जनादेश दिया था। हो सकता है, इस विवाद से पार्टियों को क्षणिक शुभ नहीं है। उपराज्यपाल जैसी संस्था की आड़ में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति दोनों पक्षों की छवि को धूमिल करेगी। इस पूरे विवाद से संदेश स्पष्ट है कि केंद्र और राज्य, दोनों को बिना किसी राजनीतिक द्वेष के एक-दूसरे का सहयोग करते हुए अपने चुनावी वायदे पूरे करने में सारी ताकत झोंकनी चाहिए नहीं तो इन दिनों मतदाता के सब्र का बांध थोड़ा जल्दी टूटने लगा है।
शशांक शेखर, नालंदा

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