मुंबई के मालाड पश्चिम के एक झुग्गी इलाके में पिछले दिनों जहरीली शराब कारण सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। सवाल है कि इन बेगुनाहों की मौत का असली जिम्मेदार कौन है। क्या इन मौतों के लिए महज कुछ व्यक्ति दोषी होते हैं जिन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है? क्या कुछ अफसरों के निलंबन या तबादले से इन घटनाओं पर अंकुश लग सकता है? इन घटनाओं की बारंबारता चीख-चीख कर किस ओर संकेत कर रही है? सच्चाई यह है कि इन घटनाओं के लिए वह मानवद्रोही व्यवस्था जिम्मेदार है जिसमें गरीब मजदूरों की जिंदगी बेहद सस्ती होती है, जहां मनुष्य को मुनाफा कमाने के लिए मशीन के एक पुर्जे से अधिक कुछ नहीं समझा जाता।
क्या प्रशासन को खतरनाक शराब बनाने वालों के बारे में पता नहीं होता है? झुग्गी बस्तियों में पुलिस की मोटरसाइकिलें और गाड़ियां रात-दिन चक्कर लगाती रहती हैं। ये पुलिसवाले यहां व्यवस्था बनाने के लिए चक्कर नहीं लगाते हैं बल्कि स्थानीय छोटे कारोबारियों और कारखानोदारों के लिए गुंडा फोर्स का काम करते हैं। सारे अपराध, सभी गैर-कानूनी काम पुलिस की आंखों के सामने और पुलिसवालों, विधायकों आदि की जेबें गर्म करके उनकी सहमति के बाद ही होते हैं। शराब को और अधिक नशीली बनाने के लिए उसमें मेथानोल और यहां तक कि कीटनाशकों का भी इस्तेमाल होता है।
चूंकि यह शराब प्रयोगशाला में जांच करके नहीं बनती और इसकी गुणवत्ता के कोई मानक भी नहीं होते हैं तो ऐसे में जहरीले पदार्थों की मात्रा कम-ज्यादा होती रहती है। असल में इस व्यवस्था में जहां हरेक वस्तु को माल बना दिया जाता है वहां जिंदगी की मार झेल रहे गरीबों के व्यसन की जरूरत को भी माल बना दिया जाता है। गरीब मजदूर बस्तियों में सस्ती शराब का पूरा कारोबार इस जरूरत से मुनाफा कमाने पर ही टिका है। इस मुनाफे की हवस का शिकार भी हमेशा गरीब मजदूर ही बनते हैं। यह घटना कोई अनोखी नहीं है और मुनाफे के लिए की गई हत्याओं के सिलसिले की ही एक और कड़ी है।
विराट, मुंबई
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