बाजार, सत्ता और मनुष्य के रिश्ते इस पृथ्वी पर शुरू से रहे हैं। मनुष्य अपनी जरूरत की वस्तुओं को लेने के लिए बाजार जाता रहा है। जो जरूरी है उसे वह जरूर लाता है, पर यहीं यह भी सोचने का विषय है कि एक उपभोक्ता कब बाजार जाता है और उसके बाजार जाने से समाज, सत्ता और मनुष्य के संबंध को समझने की तरकीब मिलती है…।
अगर एक आदमी आंखों के सामने सामान होने पर भी कुछ खरीद नहीं पाता केवल आंखें खोल कर देखता रह जाता है तो यह हमारे समय की सबसे बड़ी बेबसी है इसे समझने की जरूरत है और उसकी खरीदने की ताकत को बढ़ाने पर ही समाज और सत्ता की सेहत बनती है। हर लोकसेवक सरकार को यह सबसे पहले करना चाहिए।
विवेक कुमार मिश्र, कोटा
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