कला जगत मानो परम शोक की अवस्था से गुजर रहा है। पुणे के भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पर गजेंद्र चौहान की महाभारतीय छाया पड़ने की खबर से खलबली का-सा माहौल है। इससे जुड़े तमाम पक्ष प्रिंट मीडिया से लेकर विजुअल मीडिया तक छाए हैं। दोनों तरफ तलवारें तनी हुई हैं, न तो छात्र मानने को तैयार हैं, न हमारे युधिष्ठिरजी लाज बचाने के लिए पीछे हट रहे हैं।
अब सतह को कुरेद कर परतों को खोलने की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि इस घटना में प्रतिबंधित किए जाने जैसी बू क्यों आ रही है, वैसी ही जैसी दिल्ली विश्वविद्यालय के अंकुर नामक एक थियेटर सोसाइटी के साथ हुआ था। एक समांतर रेखा खिंचती-सी दिख रही है, जिसमें चौहान को पदभार संभालने ही नहीं दिया जाएगा और अंकुर को मंचन नहीं करने दिया जाएगा, में कोई विशेष फर्क नहीं दिख रहा। आखिर चौहान को जो जिम्मेदारी दी गई, वह है क्या! वह एक प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसमें वे दूसरों की बौद्धिकता और स्वच्छंदता को कैसे नियंत्रण में ले आएंगे, समझ के बाहर की बात है।
दूसरी दलील कि चौहान से पहले कई नामचीन लोगों ने इस संस्थान की शोभा बढ़ाई है, बतौर अध्यक्ष इन महानुभावों ने कौन से झंडे गाड़े, भले उनकी निजी उपलब्धि चाहे जो रही हो। रहा हिंदुत्ववादियों के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बोलबाले का खतरा, तो यह महज एक खोखला नारा लगता है, क्योंकि राष्ट्र की परिकल्पना के संदर्भ में अभी तक भारतीय परिप्रेक्ष्य में किसी इस्लामी, सिख या क्रिस्तानी सोच से हमारा परिचय नहीं हुआ है। फिर हिंदू सोच के राष्ट्रवाद से ऐसी घिन क्यों? एक स्वर वहां से भी उठे, इससे इतना डर और परहेज क्यों? जब हम टैगोर जैसे मनीषी के राष्ट्रवाद, अंतरराष्ट्रीयतावाद की पहेली को समझते और सराहते रहे, तो फिर आज कलाजगत में तथाकथित राष्ट्रवादियों को महामारी की तरह क्यों देखा जा रहा है?
ऐसे में क्या अन्य दृष्टिकोण, जिनमें कुछ नया या अलग करने की संभावना हो, उन्हें जड़ से कुचल डालना कुछ वैसा ही नहीं है, जैसे ब्राह्मणवाद द्वारा दलित आवाज को उठने से पहले ही खत्म कर देना! अभी तक कला, साहित्य और सिनेमा में वामपंथ और उससे जुड़ी हस्तियों का वर्चस्व असह्य बात नहीं रही है, पर आज दक्षिणपंथी तनी हुई मसें, रौब और अकड़ दिखाना निश्चय ही अपने किस्म का एक ब्राह्मणवाद है, वैसा ही ब्राह्मणवाद जिसका वामपंथ हमेशा से विरोध करता रहा है, फिर आज छात्रों को जमीन में लोटने की जरूरत क्यों आन पड़ी?
यह जबरदस्त पूर्वग्रह ही तो कहीं दक्षिणपंथियों के राजनीतिक सत्ता को पाते ही, अनाप-शनाप जुमलों, हरकतों और धृष्टता के लिए जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि कला, साहित्य और शिक्षा किसी की जागीर होने से रही! फिर कितने भी चौहान आ जाएं इतनी बेताबी क्यों? और अगर यह बेसब्री किसी खतरे का आगाज है, तो फिर जनतांत्रिक और मौलिक तौर पर प्रत्युत्तर तैयार करें, जिद से कभी धाराएं नहीं पलटतीं।
सविता, मुनीरका, नई दिल्ली
फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta