इंदिरा गांधी के आपातकाल लागू करने से सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ था कि राजनीति और अन्य लोकतांत्रिक संस्थानों में नैतिक मूल्यों का क्षरण हो गया था। उस रुझान में आज तक बदलाव नहीं आ पाया है। वह दिन अचानक नहीं आया था। धीरे-धीरे इसकी हवा बनी थी। पहले तो जनवरी 1974 में गुजरात में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों में वृद्धि हुई जिससे जनाक्रोश फैला। वह छात्रों के असंतोष के रूप में सामने आया। फिर इसका दायरा तेजी से बढ़ता गया। पूरे राज्य में हंगामों का दौर शुरू हो गया। दूसरी तरफ मार्च 1974 में बिहार के छात्र भी सड़क पर उतर आए। राजनीति से संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण ने छात्रों के बुलावे पर आंदोलन का नेतृत्व संभाला। तब उन्होंने इसे संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। 1973 से 1975 का वह दौर आंतरिक उथल-पुथल का था। श्रमिक हड़तालें हो रही थीं, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हो रहे थे। नागरिक व्यवस्था चरमरा गई थी। जनअसंतोष चरम पर था।
असल में इंदिरा गांधी जब 1966 में प्रधानमंत्री बनी थीं तब कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा कमजोर हो चुका था। के कामराज, एसके पाटिल और मोरारजी देसाई जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सोचा था कि इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बना कर वे ही पीछे से राज करेंगे। कुछ दिन यह चला। डॉ राम मनोहर लोहिया ने उन्हें गूंगी गुड़िया कहना शुरू कर दिया था। लेकिन शीघ्र ही यह गूंगी गुड़िया राजनीति में दक्ष हो गई। कांग्रेस दो गुटों में विभाजित हो चुकी थी, श्रीमती गांधी के नेतृत्व में समाजवादी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में रूढ़िवादी।
1967 के चुनाव में आंतरिक समस्याएं उभरीं जब कांग्रेस ने 60 सीटें खोकर 545 सीटों वाली लोकसभा में 297 स्थान प्राप्त किए। उन्हें मोरारजी को भारत के उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के रूप में लेना पड़ा। 1969 में मोरारजी के साथ अनेक मुद््दों पर असहमति के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विभाजित हो गई। इंदिरा गांधी ने बैंकों, बीमा और कोयला कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया। 1970 में प्रिवीपर्स समाप्त किया। 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश को स्वतंत्र करा अलग राष्ट्र की मान्यता दिलाई। दूसरी ओर गरीबी हटाओ का लोकलुभावन नारा दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने भारी बहुमत हासिल किया। उन्हें 518 में से 352 सीटें प्राप्त हुर्इं। इसके बाद इंदिरा गांधी में तानाशाही की प्रवृत्तियां प्रबल हो उठीं जिसका भयानक रूप 1975 में आपातकाल की घोषणा के रूप में सामने आया।
आज फिर आपातकाल की बात उठ रही है तो उसके पीछे कुछ तथ्य भी हैं। भाजपा सरकार ने विपक्ष और राज्यसभा की अवहेलना की और कई अध्यादेश ले आई। वह संविधान के मूल ढांचे में फेरबदल के लिए अध्यादेश का रास्ता अपना रही है। असहमति रखने वाले लोगों, समूहों, संस्थाओं और राज्य सरकारों पर दुर्भावनापूर्ण आक्रमण हो रहे हैं। आइआइटी मद्रास के ‘आंबेडकर पेरियार समूह’ पर प्रतिबंध, दिल्ली सरकार के साथ सौतेला व्यवहार, मोहन भागवत को जेड प्लस सुरक्षा मुहैया करना, बिहार में बागी मुख्यमंत्री को भड़का कर उसका उपयोग करना, फिल्म सेंसर बोर्ड, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में मंतव्य पूर्ण हस्तक्षेप, मित्र अपराधी-आरोपियोंं को संरक्षण आदि घटनाएं इंदिरा की अलोकतांत्रिक कार्यशैली की यादें ताजा करती हैं। सत्ता की शक्ति पूरी तरह एक व्यक्ति में केंद्रित हो गई है।
यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज मीडिया पूरी तरह केंद्रीय सत्ता के प्रभाव में है। पुण्य प्रसून वाजपेयी का मत है कि ‘मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि उस पर नकेल कसने के लिए अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरूरत नहीं है। आज मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुए बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई न होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जाएगा। यानी 1975 वाले दौर की जरूरत नहीं जब इमरजंसी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाए। या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठा कर बताए कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जाएगा। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है?’
आज हालात चिंताजनक हैं जो भविष्य की ओर यह इंगित करते हैं कि आगे एक कठिन समय आ सकता है। इन स्थितियों के मद्देनजर यह आशंका स्वाभाविक है कि कोई आपातस्थिति जन्म न ले ले। इसलिए देश की जनता को सावधान रहने की आवश्यकता है।
शैलेंद्र चौहान, प्रताप नगर, जयपुर
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