भारत में जातिगत आरक्षण की शुरुआत विलियम हंटर और ज्योतिबा फुले ने 1882 में अलग-अलग प्रारूपों में की जिसे छत्रपति साहूजी ने 1901 में लागू किया। यह तो रही इसके इतिहास की बात। अगर वर्तमान की बात की जाए तो यह एक कभी न खत्म होने वाला मुद्दा है और वह भी बिना किसी परिणाम के।
इस प्रारूप ने बस एक काम किया है और वह है दो समाजों में अंतर। एक समाज वह जो आरक्षण का भोगी है और दूसरा वह जो उसका हकदार होकर भी उससे वंचित है। आज आरक्षण जातीय आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर मिलने का कानून बनाया जाना चाहिए तभी वह सही मायनों में उपयोगी होगा।
वेद शुक्ला, सैय्यदयासीनपुर, प्रतापगढ़
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