देश के बुद्धिजीवी दो दिनों से आचार संहिता के एक द्वंद्व को सुलझाने में उलझे हुए हैं। वह द्वंद्व नीली कमीज, हरा चश्मा से होकर फोटुओं में छपने लायक चेहरों पर जाकर टिका हुआ है। दो दिन पहले सर्वोच्च अदालत का आदेश हुआ कि सरकारी विज्ञापनों के साथ प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के फोटू तो छप सकते हैं, लेकिन बाकी के नहीं। और इसी बीच छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से नोटिस जारी किया गया कि बस्तर कलेक्टर ने प्रधानमंत्री की अगवानी के समय नीली कमीज और हरा चश्मा पहन रखा था, यह ‘ड्रेस कोड’ का उल्लंघन है।

अब इस पर बुद्धिजीवियों की तरफ से कहा जा रहा है कि सरकारी नौकरियों की आचार संहिता अंगरेजों के जमाने की है। इसलिए अब वह बेमानी हो चुकी है। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले, लेकिन आजाद भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पदभार ग्रहण करने के साथ आदिवासी क्षेत्रों के अवलोकन का कार्यक्रम बनाया था। उसमें अविभाजित बिलासपुर जिले का एक आदिवासी गांव- रंजना शामिल किया गया था। तब तत्कालीन जिला कलेक्टर प्रशांत मेहता ने प्रधानमंत्री की अगवानी के लिए विशेष तौर पर बंद गले वाला काले रंग का सूट पहना था। और उस समय सूट के काले रंग को लेकर बुद्धिजीवियों में बहस चली थी। इस बहस के दूसरे छोर पर वे मुख्यमंत्री और राजनेता एक साथ हो रहे हैं, जिनके चेहरों को सर्वोच्च अदालत ने विज्ञापन वाली फोटुओं के लिए अपात्र कर दिया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो कह दिया कि अब सर्वोच्च अदालत को यह भी बता देना चाहिए कि (हम) क्या कपड़े पहनें।

इस उलझन को गणित के तौर-तरीकों से समझना चाहें तो समीकरण यह बनता हुआ दिखता है कि अपने-अपने वर्चस्व की यह खींचतान अब सतह पर दिखने लगी है। इसमें हमारी न्यायपालिका और कार्यपालिका एक-दूसरे के आसपास और हमारी वर्तमान विधायिका अलग-थलग दिखाई देने लगी है। बुद्धिजीवी इसमें अपनी भूमिका तलाश रहे हैं।
सतीश जायसवाल, बिलासपुर

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