भारत में नगरों और महानगरों की विकास प्रक्रिया अत्यंत अवैज्ञानिक तौर-तरीकों से बढ़ी है। यही वजह है कि आज महानगरों और नगरों में भारी ट्रैफिक जाम, बजबजाती हुई नालियां, नाले, पार्किंग सुविधाओं और सुलभ कॉम्पलैक्सों का टोटा, अस्पताल और शैक्षणिक संस्थाओं की कमी आदि अनेक समस्याएं विकराल हो गई हैं।

1947 से ही, नगरों के विकास के लिए एक राष्ट्रीय नीति होती, जिसकी दिशा-निर्देश के आधार पर नगर निगम और नगरपालिकाएं काम करतीं तो यह नौबत न आती कि जहां नदी है, वहां शहर नहीं है और जहां नगर बसे हैं वहां तीस-चालीस किलोमीटर लंबी नहरें बना कर पेयजल पहुंचाना पड़ रहा है। बहरहाल, शुभ नीति अपनाना सदैव संभव होता है।
(विजेंद्र चौरसिया, मंडला, मप्र)

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