सुशासन और भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार चलाने के दावे के साथ प्रचंड बहुमत से दिल्ली राज्य की सत्ता पर काबिज अरविंद केजरीवाल अक्सर विवादों में रहे हैं। धरना, स्टिंग ऑपरेशन, आरोप-प्रत्यारोप ही इनके राजनीतिक हथियार हैं। इन दिनों केजरीवाल और उपराज्यपाल के बीच टकराव की स्थिति रही है, ऐसे हालात पिछले बाईस सालों में कभी नहीं रहे। संविधान के अनुच्छेद 239 (एए) और (एबी) के मुताबिक दिल्ली के उपराज्यपाल को दूसरे राज्यों के राज्यपाल से ज्यादा संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं।
संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद के उप अनुच्छेद (4) के प्रावधानों में कहा गया है कि अगर उपराज्यपाल और मंत्रियों के बीच किसी बात पर मतभेद हैं तो मामले को उपराज्यपाल राष्ट्रपति को संदर्भित करेंगे और जब तक फैसला नहीं आता, उपराज्यपाल अपने विवेक से फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं जिसका पालन सरकार को करना पड़ेगा। केजरीवाल और उपराज्यपाल नजीब जंग दोनों राष्ट्रपति से भी मिल चुके हैं, बावजूद इसके विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।
जानकारों का मानना है कि उपराज्यपाल अपनी जगह सही हैं। जनता से किए वादों को पूरा नहीं कर पा रही केजरीवाल सरकार जनता का ध्यान भटकाने के लिए रोज एक बखेड़ा खड़ा कर रही है। पहले अपनी ही पार्टी में विरोध उत्पन्न करना और मर्यादाओं की सीमा को लांघ जाना, फिर किसान रैली कर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश में गजेंद्र सिंह की मौत के बाद विवादों में घिरना, मीडिया की स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने का विफल प्रयास करना और अब अधिकारियों की नियुक्ति के अधिकारों के मामले पर अड़ना। अब अरविंद केजरीवाल उपराज्यपाल के बहाने केंद्र सरकार पर निशाना साध कर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग उठाना चाहते हैं।
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा न दिए जाने के पीछे तर्क यह है कि दिल्ली में संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालय और महकमे हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर सभी सांसद, चुनाव आयोग, विपक्ष के नेता, दूसरे देशों के राजदूत और उच्चायुक्त भी रहते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। खैर वर्तमान हालात को देख कर ऐसा लगता है कि केजरी-जंग की लड़ाई में नुकसान दिल्ली की डेढ़ करोड़ जनता का हो रहा है।
अवनींद्र कुमार सिंह, दुर्गाकुंड, वाराणसी
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