दिल्ली से सटे दादरी के गांव बिसाहड़ा में गोमांस खाने की अफवाह का शिकार एक मुस्लिम परिवार हो गया और उसके एक सदस्य की जान ले ली गई। यह कैसा सौहार्द है जिसमें सिर्फ अफवाह के चलते एक परिवार को अपनी जान देनी पड़ी! यह कैसा जनमानस है, जिसमें संवेदना की कोई हलचल नहीं है? हाल-फिलहाल कई राज्यों में गोमांस खाने-बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया। किसी के लिए मांस खाना हराम है तो किसी के लिए हलाल। बात सिर्फ इतनी है कि इस बिगड़ते परिवेश में सबका साथ सबका विकास कैसे संभव होगा? केवल सिलीकन वैली में जाकर डिजिटल भारत की बात करने भर से भारत का विकास कैसे संभव है, जबकि अंदरूनी भारत में विषमता का जहर फैलाया जा रहा है?

यह उचित है कि सभी धर्म संप्रदायों को एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करना चाहिए क्योंकि हम सब उस भारत में रहते हैं जहां अनेक संस्कृतियां निवास करती हैं। मांस खाने पर प्रतिबंध स्वप्रेरित प्रक्रिया हो सकती है। अगर पर्युषण पर्व के दिन रोक लगाना उचित है तो फिर उसी दिन बकरीद का त्योहार आ जाए तब क्या विकल्प होगा? यह एक संवेदनशील मसला है जो आपसी सद्भाव से ही हल हो सकता है।

किसी एक के हित को कायम रखने के लिए दूसरे के अधिकारों की तिलांजलि देना सही नहीं है। कोई मस्जिद के लिए लड़े, कोई मंदिर के लिए, कोई धर्म की रक्षा के नाम पर घर वापसी कराए या धर्म परिवर्तन… यह सिलसिला चलता रहा तो हिंदुस्तान को महाशक्ति कैसे बनाया जा सकेगा? अगर हिंदू आस्था है गोमाता तो उस आस्था का सम्मान करना सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। वहीं किसी के लिए मांस हलाल है तो उसेखाने पर रोक लगाना भी अनुचित है।
तौफीक अहमद, मुस्ताफापुर, चंदौली

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