हमारे सभी राजनीतिक दलों ने ऐसी न जाने कितनी शख्सियतों से गलबहियां की हैं जिनपर हत्या से लेकर बलात्कार तक के गंभीर मामले दर्ज हैं। हिंदुस्तान की सियासत आज जिस ढर्रे पर चल रही है वह भ्रष्टाचार और अपराध से लबालब है। चुनाव में बढ़ता धनबल, बाहुबल और अपराधीकरण लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खा रहा है। जब कानून के निर्माता और रखवाले ही अपराध में सने होंगे तो उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि लोकतंत्र को स्वस्थ रख सकेंगे!
पहले तो बिहार और उत्तर प्रदेश को ही आपराधिक राजनीति का गढ़ कहा जाता था लेकिन पिछले दो-तीन दशकों से सभी राज्यों में ऐसी प्रवृत्ति के नेताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। आज नेताओं का उद्देश्य चुनाव जीत कर देश सेवा करना नहीं बल्कि सत्ता हासिल कर हुकूमत करना है।
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की मानें तो पंद्रहवीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 162 पर गंभीर मामले दर्ज थे और सोलहवीं लोकसभा में इनकी संख्या और भी बढ़ गई। इसका एक बड़ा कारण जनप्रतिनिधित्व कानून का लचीला होना भी है। सन 2006 में चुनाव आयोग ने देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा। उस पत्र में गया था कि यदि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में जरूरी बदलाव नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब देश की संसद और विधानसभाओं में दाऊद इब्राहीम और अबू सलेम जैसे लोग बैठेंगे। ‘हम्माम में सभी नंगे हैं’ की तर्ज पर सभी राजनीतिक पार्टियों की गोद में ऐसे अनेक नेताओं की किलकारियां गूंजती हैं जो अपराध में गले तक डूबे हैं।
अब तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल स्वयं इस दलदल से नहीं उबरना चाहते तभी तो अधिकतर पार्टियों ने सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का विरोध किया था जिसमें कहा गया था कि यदि अदालत विधायिका के किसी सदस्य को दो साल या उससे अधिक की सजा सुनाती है, तो वह अपनी सदस्यता बरकरार नहीं रख सकता। इसी फैसले को बेअसर करने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा संसद में विधेयक लाया गया था जो पास नहीं हो सका।
सोलहवीं लोकसभा के चुनाव प्रचार में मोदीजी अपने भाषणों में कहा करते थे कि उनकी पार्टी में या तो वे रहेंगे या ऐसे लोग जिन पर किसी भी प्रकार के मुकदमे दर्ज हैं। तब एक उम्मीद जगी थी कि शायद अब राजनीति में फिर से शुचिता का उदय होगा लेकिन सत्तानशीं होने के बाद भाजपा के कुनबे में तो छोड़िए, मोदीजी ने अपने मंत्रिमंडल में ही ऐसे अनेक नगीनों को शुमार कर लिया जिनमें से कइयों पर संगीन आरोप हैं।
नेताओं और अपराधियों की दिनोंदिन बढ़ती सांठगांठ चिंतित करने वाली है। वैसे सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाताओं को नापसंदगी का हक देकर एक ठोस पहल की थी। हालांकि चुनाव सुधार के लिए तारकुंडे समिति, गोस्वामी समिति, वोहरा कमेटी जैसी अनेक समितियों ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी हैं लेकिन निजी हितों के कारण किसी भी दल ने इन्हें लागू करने की जहमत नहीं उठाई। आज जरूरत व्यापक चुनाव सुधार की है जिससे राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोका जा सके। इसके लिए पार्टियों को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर
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