राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठन देश की संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की बेहद संर्कीण व्याख्या करते हुए देश को हिंदू राष्ट्र बनाने पर तुले रहते हैं। जब-जब कुछ प्रांतों में उनकी भारतीय जनता पार्टी की सरकारें आर्इं तब-तब इन सरकारों ने संघ के एजेंडे को लागू करने की कोशिश पूरे मनोयोग से की है। आज तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र में इनकी पूरी-पूरी और पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार सहित केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ संघ के प्रचारकों की सरकार है। इसलिए संघ और उसके आनुषंगिक संगठन बहुत ही अधैर्य और हड़बड़ी में देश को हिंदू राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं।
जवाहरलाल नेहरू के बाद उनकी कांग्रेस ने जिस कायराना ढंग से हिंदुत्व के आगे निर्लज्ज समर्पण किया है उसी के कारण कांग्रेस का पतन हुआ और आज देश को संकीर्ण राजनीति का शिकार होना पड़ा है। स्कूलों में सूर्य नमस्कार, गीता को पढ़ाने की बात संघ के हिंदू राष्ट्र की स्थापना की दिशा के कदम हैं। मुकेश भारद्वाज के संतुलित लेख ‘गीता पर महाभारत’ (13 जून, जनसत्ता) ने शिक्षा और संस्कृति पर एक वस्तुनिष्ठ बहस की संभावनाओं को जन्म दिया है। यहां शिक्षा और संस्कृति पर बहुत ही संक्षिप्त टिप्पणी करके यह उम्मीद करता हूं कि बात निकली है तो लोग दूर तलक ले जाएंगे।
हमारे समाज में किसी भी धार्मिक ग्रंथ (गीता, रामायण, कुरान, बाइबिल, ग्रंथ साहिब आदि) को पाठ्यक्रम का अंग बनाने की बहुत बड़ी सीमा यह होती है कि उस ग्रंथ को केवल महान बताने के विकल्प ही शिक्षक के सामने बचते हैं। उनमें कही गई बातों की आलोचना या कमियों की चर्चा की गुंजाइश नहीं होती। जनमानस की आस्था का विषय होने के कारण धर्मग्रंथ आलोचनात्मक टिप्पणियों से परे होते हैं। उन पर किसी तरह के प्रश्न खड़े नहीं कर सकते, तर्क नहीं कर सकते, असहमति नहीं जताई जा सकती, बहस नहीं हो सकती, ईमानदारी से उनका तुलनात्मक अध्ययन नहीं हो सकता। जब इन सीमाओं में शिक्षा दी जाएगी तो कौन-सा मानसिक विकास हो सकता है?
जिन्होंने संस्कृति का अपहरण करके उसकी अत्यंत सीमित व्याख्या की है वे ही संस्कृति के ‘महान ध्वज वाहक’ बने हैं। हरियाणा के मंत्री अनिल विज कहते हैं कि जब भी अपनी संस्कृति, विरासत और इतिहास की बात करते हैं तो ‘राष्ट्रविरोधियों’ को तकलीफ होने लगती है। अपने तंग नजरिए की वजह से संघ परिवार हिंदुत्व तक सीमित संस्कृति को ही पूरे देश की संस्कृति मानता है। वे हिंदुओं के अलावा करोड़ों मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों, बौद्धों, आदिवासियों, जैनों, सिखों को इस देश का नागरिक केवल हिंदुत्व की शर्तों पर ही मानना चाहते हैं। उन्हें इस देश की बहुरंगी, बहुलतावादी, बहुविद साझा संस्कृति का या तो भान ही नहीं है या जानबूझ कर उसे नकारने की विफल कोशिश वे करते रहते हैं। साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, प्रवीण तोगड़िया सहित भाजपा के अन्य जिम्मेवार सदस्यों के वक्त-बेवक्त के बयान इन बातों के सबूत हैं। सौभाग्य से हमारी गौरवमयी संस्कृति इतनी संकीर्ण नहीं है।
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल
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