धर्म और जाति संबंधी श्रेष्ठता की मानसिकता बहुत कुछ हमारी सांप्रदायिक भावना को उभारने के लिए उत्तरदायी है। श्रेष्ठता की मानसिकता दूसरे के महत्त्व को स्वीकार करने की गुंजाइश समाप्त कर देती है और जब तथाकथित श्रेष्ठ तबके के अहं को कहीं ठेस पहुंचती है तो वह सांप्रदायिकता पर उतर आता है। यह एक सामंती मनोवृत्ति है जो समानता की भावना के विपरीत है। किसी भी समस्या के पीछे कार्य-कारण संबंध होता है जो संपूर्णता में एक वस्तुगत विश्लेषण की दरकार रखता है, तभी हम सही नतीजे पर पहुंच सकते हैं।
यों तो हमारे देश में हिंदू-मुसलिम के अलावा अन्य समुदायों और विभिन्न क्षेत्रीयताओं, वर्णों और जातियों के बीच भी मारकाट मचती रही है। तमिलनाडु में हिंदी वालों के प्रति नफरत फैलाई गई जो वर्षों तक चली। उत्तर-पूर्वी प्रांतों में वहां की जनजातियों के बीच लगातार मारकाट होती रही है। मुंबई में पहले दक्षिण भारतीयों के खिलाफ दंगे किए गए और बाद में बिहारियों के लिए नफरत परोसी गई। बंगाल में नक्सलवादियों के खिलाफ कांग्रेस और माकपा ने भारी जंग लड़ी। गोरखालैंड का पूरा आंदोलन बंगालियों के विरोध पर केंद्रित रहा। 1984 के सिख विरोधी दंगे तो बड़े पैमाने पर चले। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को बेदखल किया गया। दलितों और सवर्णों के बीच भी कई बार मारकाट हुई, शिया-सुन्नी दंगों का भी लंबा इतिहास है। लेकिन भारत में जब भी सांप्रदायिकता की बात चलती है तो उसका आशय हिंदू-मुसलिम संबंधों में आपसी द्वेष से ही लिया जाता है।
यदि सांप्रदायिकता की समस्या के समाधान की भी बात की जाती है तो हिंदू-मुसलिम विरोध को समाप्त करने का ही अर्थ लिया जाता है। असल में, भारत में संप्रदाय का तात्पर्य हिंदू-मुसलिम विभाजन से ही है। एक औसत हिंदू की मानसिकता यह बना दी गई है कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर अपना हिस्सा हासिल कर चुके हैं, अब उन्हें भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है। और यदि रहना है तो उनके अधीन होकर रहें!
हमारे इस सांप्रदायिक जुनून के लिए बहुत कुछ कानूनी व्यवस्था का अभाव, विधायिका और संवैधानिक निष्क्रियता भी दोषी है। हमारा संविधान तो निष्क्रिय इसलिए हो रहा है कि वह 50-60 साल से ऐसे हाथों में ही रहा है जो सांप्रदायिकता को उत्प्रेरक के रूप में प्रयोग करने वाले थे। आज भी यही स्थिति है। यहां तक कि आज हमारी पूरी की पूरी राजनीति ही सांप्रदायिकता के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। समाजवादी और वामपंथी भी साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, गरीबी, साधनहीनता और बेरोजगारी की बात न करके पिछले छह दशकों से सत्ता पर काबिज रही पार्टी की विचार पद्धति को अपना चुके हैं। उनके लिए अब सांप्रदायिकता ही देश की मूल समस्या है बाकी सब गौण। अब इसे क्या कहा जाए कि सबके सब सांप्रदायिकता की मशाल लेकर मैदान में हों और यह न महसूस कर सकें कि ऐसे कार्यों से सांप्रदायिकता कम नहीं होती बल्कि बढ़ती ही है।
दुर्भाग्य से हमारे कुछ बुद्धिवादियों के लिए सांप्रदायिकता एक ऐसा बांड है जिसे वे कभी भी और कहीं भी भुना सकते हैं। सांप्रदायिकता पर उनका इतना विशद अध्ययन है कि अब उनसे कोफ्त होने लगी है क्योंकि पूरे भारतीय समाज की हर समस्या को वे सांप्रदायिकता से कमतर आंकते हैं।
यह भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है। यह भी हम जानते हैं कि भारत की संघीय सरकार ने पिछले छह दशकों में सांप्रदायिक सौहार्द को बचाने के बजाय इसकी खाई को अधिक चौड़ा ही किया है। संविधान में स्पष्ट लिखा गया है कि किसी भी धार्मिक संगठन को सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों के अतिरिक्त, अन्य किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता उभारने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पर हम देखते रहे हैं कि सांप्रदायिकता हमेशा ही उभारी गई है और संविधान को ताक पर रख दिया गया है। यहां राजनीतिकों ने अल्पसंख्यक समुदाय को हमेशा वोट बैंक के रूप में देखा है। उनमें सामाजिक बोध और वैज्ञानिक चेतना को विकसित न करके नितांत रूढ़िवादी और संकीर्णता के दायरे में कैद रहने देने में ही अपने स्वार्थ की पूर्ति की है। हिंदुओं में भी अल्पसंख्यकों को अधिक तरजीह देने के प्रतिक्रियास्वरूप वैमनस्य उभरा है। धर्म और संप्रदाय के नाम पर राजनीतिक पार्टियां बनाई गई हैं। क्या इन क्रिया कलापों से सांप्रदायिकता को मिटाया जा सकता है?
शैलेंद्र चौहान, प्रताप नगर, जयपुर
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