के. विक्रम राव का लेख ‘दीये और तूफान की लड़ाई’ (19 मई) पढ़ कर अच्छा लगा वरना डॉलर की भीनी खूशबू के सामने कौन याद करता है आज विएतनाम के उन महान देशभक्तों को जिन्होंने पृथ्वी के अब तक के सबसे बड़े साम्राज्य को धूल चटा दी! लेकिन लेख का अंत उतना तथ्यपरक नहीं रहा। आजादी के बाद से आज तक हम भारत-चीन सीमा को लेकर भुलावे में जी रहे हैं।
हमारे देश की जनता से पंडितजी ने भी इस बारे में झूठ बोला था और आज के राजनेता और तथाकथित बुद्धिजीवी भी यही कर रहे हैं। भारत-चीन सीमा विवाद हल न होने का प्रमुख कारण मेरी समझ से यही है।
वास्तव में भारत और चीन की सीमा का पश्चिमी सेक्टर में कभी निर्धारण ही नहीं था तो फिर चीन ने उस पर अतिक्रमण कैसे कर लिया? नेफा पर चीन का दावा काफी बाद, 1960 के आसपास का है। और यह महज एक दांव हैं पश्चिमी सेक्टर में अपनी मांग मनवाने का। जितनी जल्दी इस मुद्दे पर हम तथ्यपरक हो सकें, दोनों देशों के परस्पर संबंध और आम लोगों के जीवन-स्तर के लिए उतना ही अच्छा। अन्यथा हम एक-दूसरे से लड़ने के लिए हथियार बनाते रहेंगे और अवाम की आर्थिक स्थिति जर्जर बनी रहेगी।
प्रशांत सिंह, नई दिल्ली
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