कुलदीप कुमार ने ‘फासिज्म की आहट’ (निनाद, 31 मई) टिप्पणी में आरएसएस और बाबा साहेब आंबेडकर के अंतर्विरोधों पर चिंता जाहिर की है। यह सच है कि बाबा साहेब ने कभी भी मनुस्मृति को स्वीकार नहीं किया। 1927 में उन्होंने मनुस्मृति का दहन किया। गौरतलब है कि आंबेडकरजी ने 1935 में घोषणा की थी कि वे हिंदू जन्मे जरूर हैं लेकिन हिंदू मरेंगे नहीं। इक्कीस साल बाद उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया जो कि हिंदू धर्म के सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक मूल्यों से पूरी तरह से अलग नहीं है। यही वजह थी कि उनका हिंदुत्व के साथ आलोचनात्मक टकराव लगातार जारी रहा। कह सकते हैं कि बाबा साहेब हिंदुओं के खिलाफ नहीं थे बल्कि उनका विरोध तो ब्राह्मणवाद से था जो कि शोषण की एक विचारधारा और व्यवस्था है, जिसका किसी विशेष पार्टी से संबंध नहीं है।

बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म को अपनाने के लिए इक्कीस साल का समय लिया। उन्होंने अपने लेखन के तीसरे खंड में लिखा है ‘क्या मैं हिंदू हो सकता हूं’। आंबेडकरजी का सरोकार समाज के सभी वर्गों के लिए था। उनकी दृष्टि में सामाजिक समरसता अधिक महत्त्व रखती है, पर समानता के बिना समरसता की कल्पना असंभव है। लेखक ने कहा कि ‘आंबेडकर के अनुयायी भले ही हर समय जाति आधारित आरक्षण की बात करें, वे खुद इसके खिलाफ थे और दलितों को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते थे। उनका लक्ष्य जाति को समाप्त करना था, जाति व्यवस्था को मजबूत करना नहीं।’

इस बात में सच्चाई है कि बाबा साहेब जाति को समाप्त करना चाहते थे लेकिन जाति को लेकर उनकी समझ इतनी सतही नहीं थी जितनी कुलदीप कुमार की है। बाबा साहेब के अनुसार जाति सिर्फ एक ‘स्टेट आॅफ माइंड’ नहीं है जो आरक्षण को हटाने पर समाप्त हो जाएगी। यह एक सत्ता की संरचना है जिसके तहत दलितों को जानबूझ कर समाज के हर क्षेत्र से बाहर रखा जाता है। आंबेडकरजी जाति के इस आयाम से अच्छी तरह परिचित थे इसलिए उन्होंने अपनी समानता की परिभाषा में सामाजिक विरासत पर खासा जोर दिया था। जाति के इस चक्रव्यहू से बाहर निकलने के लिए ही उन्होंने ब्रिटिश सरकार से दलितों के लिए ‘पृथक निर्वाचन’ की मांग की थी। 1932 में आखिरकार हार कर उन्होंने पूना पैक्ट में दलितों के लिए सीटों के आरक्षण पर अपनी सहमति दी थी।

दरअसल, आरक्षण कोई समाज को विभाजित करने का माध्यम नहीं है और न जाति को बनाए रखने का जरिया, बल्कि यह तो राष्ट्र निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाता है। आरक्षण तो वास्तव में जाति को तोड़ने का कार्य करता है। साथ ही यह शोषित, वंचित तबकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप से सशक्त भी करता है।
मुकेश कुमार बैरवा, दिल्ली विश्वविद्यालय

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