वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देख कर एक बात तो बिल्कुल साफ है कि अब जनता को यह भी समझना होगा कि, यह जरूरी नहीं कि जो पार्टी तमाम वादे करके सत्ता में आए वह अपने वादे निभाए भी इसका सबसे अच्छा उदाहरण हम वर्तमान में केंद्र में शासन कर रही भाजपा सरकार से लगा सकते हैं।

भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी वादों के रथ पर सवार होकर सत्ता में आए थे। इतने वादे कि कोई भी ऐसा मुद्दा नहीं बचा था जिस पर कि मोदी ने काम करने की बात नहीं की हो। पहले साल में संसद को दागियों से निजात दिलाने की बात हो या फिर काला धन वापस लाने की, अच्छा शासन देने की बात हो या फिर घोटालों पर रोक लगाने की। लेकिन एक भी काम नहीं हुआ।

अगर कुछ हुआ है तो विदेशों की यात्राएं, लेकिन कूटनीति में फिर भी पूरी तरह से फेल। अगर फेल नहीं होते तो चीन लखवी के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में वीटो नहीं करता। एक साल पूरा होने पर चीख-चीख कर अपनी सत्ता पर गुमान करते हुए मथुरा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोल रहे थे कि हमारी सरकार पर एक भी दाग नहीं लगा।

अब दाग क्या, पूरे कपड़े ही उतर गए। सुषमा स्वराज हों, वसुंधरा राजे हों, शिवराज सिंह चौहान हों, महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे हों या फिर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह हों, सभी के सभी घोटालों के महाजाल में फंसे हैं।

मनमोहन सिंह की चुप्पी का विकल्प बन कर आए प्रधानमंत्री मोदी खुद चुप हो गए हैं। तमाम तरह के घोटालों पर एक शब्द भी नहीं बोल रहे, ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही। गीता, गंगा, गोडसे और गौमूत्र पर अब बयानबाजी बंद है, क्योंकि ये घोटाले ही नहीं संभल रहे सरकार से। वैसे ऐसे समय में एक बात तो याद आती है कि सिर्फ वादे करने के आधार पर जनता को अपना प्रतिनिधि नहीं चुनना चाहिए।
चमन कुमार मिश्रा, नोएडा

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