यह सत्ता की चाशनी ही है जो दो दोस्तों को दूर करने या फिर पास-पास लाने का माद्दा रखती है। वैसे भी राजनीति में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता। भारतीय राजनीति में ऐसी अनेक नजीर हैं और उन्हीं में दो नाम लालू यादव और नीतीश कुमार हैं। छात्र आंदोलन से उभरे इन नेताओं ने बिहार की राजनीति को व्यापक रूप से बदल दिया। 1990 में लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने और फिर नीतीश के साथ मिल कर सामाजिक लड़ाई में जुट गए। लेकिन इस लड़ाई ने 1994 में निजी वर्चस्व की महत्त्वाकांक्षा के चलते दम तोड़ दिया। नीतीश ने एक नई पार्टी बनाने की घोषणा की जिसका नाम समता पार्टी पड़ा। जब समता पार्टी ने सीपीआई (एमएल) से गठबंधन किया तो लालू ने झट से भाकपा के साथ गलबहियां कर लीं। 1991 में लालू का मुख्य आधार मुसलिम, यादव और पिछड़ा वर्ग रहा।
लालू यादव ने लगभग पंद्रह साल तक बिहार पर राज किया तब लोगों के बीच एक जुमला बन गया था कि ‘जब तक समोसे में आलू रहेगा, तब तक बिहार में लालू रहेगा’। लेकिन आज समोसे में आलू तो है मगर बिहार के अवाम ने लालू को सत्ता में नहीं रहने दिया। 1994 के बाद लालू यादव की चपेट से बचने के लिए जनता दल (एकी) और भाजपा ने गांठ जोड़ी और अंतत: 2005 के चुनावों में जनता दल (एकी) और भाजपा ने मिलकर बिहार में अपनी सरकार बना ली। 2010 के विधानसभा चुनावों में भी यह गठबंधन मजबूत रहा और यहीं से नीतीश के अहंकार ने गठबंधन में तमाम पेच पैदा करना शुरू कर दिए। उसकी परिणति 2014 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन टूटने के रूप में हुई।
इस छोटे-से घटनाक्रम को समझने पर एक बात तो साफ हो जाती है कि राजनीतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य यही है कि उन्हें किसी भी तरह सत्ता की मलाई खाने को मिले। वर्तमान में एक बार फिर जनता परिवार के रूप में स्थानीय दलों का विलय हुआ लेकिन इस जनता परिवार और 1977 के जनता परिवार में बहुत बड़ा अंतर है। उस समय इनका मिलन कांग्रेस के खिलाफ था जिसमें आज की भाजपा भी थी। लेकिन समय बदलने के साथ इनकी मुखालफत भाजपा के साथ हो गई है जिसमें कड़वे घूंट तक पिए जाने की बातें की जा रही हैं। बहरहाल, आज लोहियावादी मुलायम सिंह यादव इनके सारथी बने हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इन दलों से लगाव है बल्कि उन्हें भी अपनी पार्टी को लेकर एक डर सताने लगा है।
दरअसल, मुलायम की मध्यस्थता में जनता दल (एकी) -राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन हुआ जिसमें चुनाव से पहले ही नीतीश को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया है। भारतीय जनता पार्टी बिहार में अब अपने पत्ते नहीं खोलेगी क्योंकि उसे पता है कि यदि मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया जाएगा तो जो नेता बचेंगे वे चुनाव में पूरी सक्रियता नहीं दिखाएंगे। वैसे भी बिहार भाजपा में जो बड़े चेहरे हैं वे सभी जातियों में मान्य नहीं हैं चाहे वह सुशील मोदी हों, रविशंकर प्रसाद या सीपी ठाकुर हों। इसलिए भाजपा मोदी को ही चेहरा बना कर बिहार की जंग में उतरेगी और इसे दूसरे दलों द्वारा चुनावी मुद्दा बनाया जाना तय है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए अब बिहार का किला फतह करना आसान नहीं होगा। बिहार चुनाव में एकजुट पार्टियां दिल्ली में भाजपा की जबरदस्त हार को भी मुद्दा जरूर बनाएंगी और साथ ही मोदी सरकार के एक साल पूरे होने का वास्तविक परीक्षण भी होगा। बिहार की पूरी लड़ाई में पासवान के साथ-साथ भाजपा ने मांझी को भी अपना खेवनहार बनाया है। ऐसे में उसके सामने सीटों के बंटवारे को लेकर भी जबरदस्त चुनौती होगी। अब देखने वाली बात यह रहेगी कि इक्कीस प्रतिशत महादलित वोट बैंक क्या बिहार में भाजपा का कमल खिला पाएगा? क्या लालू और नीतीश की जोड़ी उन्हें सत्तानशीं कर पाएगी? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जनता दल (एकी)-राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन की डोर कितनी दूरी तय कर पाएगी? क्या नीतीश कुमार को अब उस कथित तानाशाह से मोह हो गया है जिसके शासन को वे जंगलराज कहा करते थे! यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। चाहे जो हो पर एक बात साफ है कि बिहार में सियासत सिर्फ ‘आम’ की रही है, अवाम की नहीं।
धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर
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