सोलहवीं लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रसिद्ध नारा था कि ‘मैं चाय वाला हूं।’ उन्होंने अपने बचपन में चाय बेची थी। उनका दावा था कि गरीबों, असहायों, किसानों की समस्याओं और उनके दुख-दर्द से वे भली-भांति परिचित हैं और प्रधानमंत्री बनते ही उनके दुख-दर्द से निजात दिलाने के लिए कार्य करेंगे। उनके इन्हीं वादों और आभासी जमीनी जुड़ाव के कारण जनता ने सभी पार्टियों को दरकिनार करते हुए उन्हें पूर्ण बहुमत प्रदान किया, जो कि उनकी अपेक्षाओं से भी कहीं ज्यादा था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में लालकिले की प्राचीर से अपने-आप को प्रधानमंत्री न मानते हुए, ‘प्रधान सेवक’ घोषित किया। आज एक वर्ष से ज्यादा बीतने के बाद उनकी ‘प्रधान सेवक’ वाली छवि धूमिल होती नजर आ रही है।

मोदीजी भूमि अधिग्रहण विधेयक और बालश्रम अधिनियम जैसे तमाम संशोधन बिलों द्वारा अपने वादों पर खरे उतरेंगे, इसमें संदेह है। मोदीजी अपने बचपन में बेहद संघर्ष के बावजूद देश के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर तय किया। क्या ऐसा ही भाग्य भारत के प्रत्येक बच्चे का होगा? क्या प्रत्येक बच्चा बालश्रम के बावजूद अपने आपको ऊंचे ओहदे पर प्रतिस्थापित कर सकेगा? अगर ऐसा नहीं है तो क्यों मोदीजी की सरकार बच्चों के अधिकारों से वंचित करने की साजिश रच रही है और बालश्रम (प्रतिबंध और नियमन) अधिनियम में संशोधन करने को आतुर है?
राहुल कुमार यादव, वाराणसी</strong>

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