एक अजीब-सी बहस देश में गोमांस खाने-न खाने को लेकर छिड़ी हुई है। हालांकि गोमांस को खाने-न खाने संबंधी सबके अपने-अपने तर्क हैं, मगर उनका आम आदमी से कुछ लेना-देना नहीं। कोई क्या खाता है, क्या नहीं खाता, यह खाने वाले की नितांत व्यक्तिगत पसंद-नापसंद पर निर्भर करता है। चूंकि मसला गोमांस के खाने-न खाने से जुड़ा है, इसलिए बहस की हवा भी गर्म है।
अभी हाल एक केंद्रीय मंत्री ने भी बयान दे डाला कि ‘हां, गोमांस मैं भी खाता हूं। रोक सको तो रोक लो।’ हालांकि अगले ही दिन उन्होंने अपने कहे से पल्ला झाड़ लिया। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि ठीक है आप गोमांस खाते हैं तो खाएं, पर इसको पूरे देश में गाने की क्या आवश्यकता है? न आप गोमांस न खाकर कोई सामाजिक-क्रांति कर रहे हैं, न खाकर। फिर इस बेमतलब बहस का क्या अर्थ है?
अच्छा सबसे बड़ा ‘विद्रूप’ यह है कि कथित गौ-रक्षकों को भी अपनी माता (गाय) की याद तब ही आती है, जब उन पर कोई धार्मिक या आस्थागत संकट आता है। तब उनका प्रेम गाय के प्रति इस कदर बढ़ जाता है कि क्या बताया जाए। लेकिन शायद वे यह नहीं जानते या जानना नहीं चाहते कि आज की तारीख में गाय की सेहत और खुराक का क्या हाल है? वे यह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि किन-किन हानिकारक इनजेक्शनों का प्रयोग करके गाय के थनों में से दूध निकाला जा रहा है। क्या यह बात हम पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि आज जो दूध हम पी रहे हैं, वह सौ फीसद शुद्ध ही है!
देशी नस्ल की गायों पर संकट किसी से छिपा नहीं है। विदेशी संकर नस्ल की गायें अब देशी नस्ल की गायों का स्थान लेती जा रही हैं। हकीकत यह है कि विदेशी संकर नस्ल की गायों का दूध देशी नस्ल की गायों के मुकाबले ‘पौष्टिक’ नहीं है। यह विदेशी दूध डायबिटीज और दिल की बीमारियों के मरीजों के लिए ‘नुकसानदेह’ साबित हो सकता है। विदेशी संकर नस्ल की गायों से होने वाले लाभ भी दीर्घकालिक नहीं हैं। इन गायों से ज्यादा मात्रा में दूध तो मिल सकता है, लेकिन देसी गायों की तुलना में इनका दूध जल्दी सूख जाता है। विदेशी बैल भी देसी के मुकाबले कम हृष्ट-पुष्ट होते हैं। साथ-साथ हमें यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि भारत में गोमांस का कारोबार सालाना छह हजार-दस हजार करोड़ रुपए का है।
गाय के प्रति केवल ‘भक्तिभाव’ या गोमांस के खिलाफ बेतुके बयान देने से काम नहीं चलेगा। अगर वाकई गाय को बचाना है तो उसके हित में ‘ठोस कदम’ उठाने होंगे। वरना यों ही करते रहिए कुतर्क, जिनका हासिल न समाज को होना है-न गाय को। हां, राजनीति या नेताओं को भले ही हो जाए।
अंशुमाली रस्तोगी, बरेली
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