सवाल खड़े करने वालों को मौत के मुंह में खड़ा किया जा रहा है, और उनकी भी खबर खबरनवीस लिख रहे हैं; लेकिन तब तक उस खबर को लिखने वाला भी खबर बन जाता है, क्योंकि उसे भी मार दिया जाता है। ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ये मौतें स्वाभाविक हैं या फिर फासिज्म की शुरुआत है? और शुरुआत उनसे क्यों, जो लोकतंत्र के प्रहरी हैं? सबसे पहले मीडिया में जगेंद्र सिंह का मामला आया, उसे आग लगा कर मार दिया गया, फिर मध्यप्रदेश में अक्षय सिंह की मौत और अब फिर उत्तर प्रदेश में पत्रकार की मां को जिंदा जला दिया गया आखिर क्यों?

इन सब बड़े मामलों के अलावा कई मामले ऐसे भी हुए हैं जिन्हें हमारी मीडिया ने तवज्जो नहीं दी। इन सब मौतों की वजह से पत्रकारों के मन में एक खौफ तो बन ही गया है, खासकर उनके दिमाग में जो निष्पक्ष होकर खबरों को रखते हैं। ऐसे में एक साल और एक महीने की सरकार के सामने यह सवाल चट््टान की तरह खड़ा हो गया है कि खबरनवीसों की रक्षा कौन करेगा? अपनी जान जोखिम में डाल कर लोगों के लिए खबरें लाने वाले आज खुद ही खतरे में क्यों हैं?
(चमन कुमार मिश्रा, नोएडा)

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