सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। मुख्यमंत्री भी तो संवैधानिक पद है। उसकी अपनी गरिमा है और फिर वह तो जनता से चुन कर आया है। कल यदि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री में किसी बात को लेकर खटक जाए तो परिणाम चुने गए प्रतिनिधि यानी सीधे-सीधे प्रधानमंत्री के पक्ष में जाएगा। ये बड़े-बड़े वकील, जो मोदीजी के हर कृत्य को महिमामंडित कर रहे हैं, राष्ट्रपति को आड़े हाथों लेने में भी सबसे आगे रहेंगे। कल्याण सिंह के मामले में यह हो चुका है। कल्याण सिंह को धता बताने वाले जगदंबिका पाल आजकल भाजपा के माननीय सांसद हैं और भाजपाइयों ने तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी को लोकतंत्र का हत्यारा तक कहा था। यानी जब दूसरे पर पड़े तो मजे लो और संविधान का पाठ पढ़ाओ और जब अपनी बारी आए तो चिल्ल-पौं मचाओ!
अरविंद केजरीवाल अच्छे हैं, बुरे हैं, योग्य हैं, अयोग्य हैं पता नहीं, पर मेरी समझ कहती है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि का ही वर्चस्व होना चाहिए। एक तरफ लोकतंत्र और दूसरी तरफ संविधान! लोकतंत्र के लिए अनेक बार संविधान बदला गया है और आगे भी गुंजाइश है। संविधान की आड़ में लोकतंत्र प्रभावित नहीं होना चाहिए। दूसरी बात, जो चीज अब तक नहीं हुई इसका मतलब यह तो नहीं कि वह आगे नहीं हो सकती। यदि किसी कानून या नियम से जनता की भलाई होती है तो ऐसे कानून बनाने में सभी पार्टियों को सहयोग करना चाहिए।
केंद्र शासित प्रदेश की कुछ शक्तियां केंद्र सरकार के पास सुरक्षित रहें पर कानून व्यवस्था और दिल्ली की जमीन का जिम्मा तो मुख्यमंत्री के पास रहना चाहिए। तिजोरी तो मुख्यमंत्री के पास रहे पर उसकी चाबी केंद्र के पास हो, यह व्यावहारिक नहीं है। आप केजरीवाल को अधिकार दीजिए और फिर उनकी योग्यता परखिए। चारों तरफ से हाथ बांध रखे हैं और कहते हैं कि उछलो! क्या यह संभव है? यह कांग्रेस या भाजपा का मसला नहीं है, एक चुने गए और एक नियुक्त किए व्यक्ति के अधिकारों का सवाल है।
यतेंद्र चौधरी, वसंत कुंज, नई दिल्ली
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