आज जो लोग सेना में सेवा के लिए जाते हैं उनका मकसद होता है देश की रक्षा करना। इसके लिए वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में रहते हैं। लेकिन जब इन्हीं सैनिकों का देश के अंदरूनी दुश्मन ही कत्लेआम कर देते हैं तो अनेक सवाल उठते हैं। आखिर सैनिकों से इनकी क्या दुश्मनी? वे तो केवल देश की रक्षा में लगे हैं, देश की व्यवस्था तो राजनीतिक लोग देखते हैं। क्यों नहीं करते ये लोग अलगाववाद, नक्सलवाद, माओवाद या अन्य किसी  ‘वाद’ की समस्या का समाधान?

क्या देश के सैनिक देश के ही लोगों के हाथों शहीद होते रहेंगे? यदि इन आतंकवाद को जन्म देने वाली समस्याओं का कोई राजनीतिक समाधान नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी सेना को क्यों नहीं? दो-चार लोग बीसियों जवानों को मार कर चले जाते हैं और नेता श्रद्धांजलि और मुआवजे की घोषणा करके औपचारिकता पूरी कर देते हैं। कब तक सैनिक रखेंगे संयम? हर समस्या का समाधान है, इच्छा हो कुछ कर गुजरने की। अब भी समय है कि सभी राजनीतिक दल देश की ही खातिर साथ बैठ कर केवल बात न करें, समाधान निकालें।
यश वीर आर्य, नई दिल्ली

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