देश की गुप्तचर संस्था ‘रॉ’ के पूर्व मुखिया एएस दुलत ने अपनी किताब में 2002 के दुर्भाग्यपूर्ण दंगों का तो जिक्र किया, लेकिन वह किस्सा ‘शायद’ लिखना वे भूल गए कि 27 फरवरी, 2002 के दिन गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस के खास उसी डिब्बे को आग लगाई गई थी, जिसमें उनसठ निर्दोष और निहत्थे कारसेवक सवार थे।
दंगे बिना किसी वजह के नहीं हुए थे। श्रीमान दुलत जैसा एकतरफा पक्षपात तो कोई नकली सेक्युलर ही कर सकता है। पूर्णत: निष्पक्ष और इंसानियत से छलकते व्यक्ति से ऐसे पक्षपात की अपेक्षा कतई नहीं थी।
हंसराज भट, मुंबई
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