मेरी समझ में एक आम व्यापारी की नजर प्रतिबद्धताओं या निष्ठाओं पर कम, अपने हित-अहित या मुनाफे पर अधिक रहती है। यह स्वाभाविक भी है। उसे धंधे से ही कमाना है। उसके पास सरकारी नौकरी, पेंशन, खेती-जमीन या फिर अन्य प्रकार की सुविधाएं कहां हैं? इसलिए वह रात-दिन अपने व्यापार को विस्तार देने में लगा रहता है। जैसे-जैसे उसकी कमाई बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उसको मजा आने लगता है और फिर वह उचित-अनुचित साधनों से और अधिक कमाने के रास्ते तलाशता रहता है। हां, इस सारी प्रक्रिया में उसे यह मालूम रहता है कि पैसे के अलावा सामाजिक प्रतिष्ठा और ख्याति का अपना एक अलग महत्त्व है जिसे पैसे से खरीदना मुश्किल है। यह कसक उसके मन में सदैव बनी रहती है। तब उसे एक रास्ता सूझता है कि क्यों न पैसा देकर यह प्रतिष्ठा अर्जित की जाए!

बहुत पहले की बात है। मैं जिस नगर में पढ़ाता था वहां के एक माने हुए व्यवसायी से एक दिन मेरी मुलाकात हो गई। उस जमाने में उनके पास दो-दो पेट्रोल पंप थे और टायर, मोटर-पार्ट्स आदि की दुकान भी थी। मेरा कॉलेज आते-जाते अक्सर उनकी दुकान से गुजरना होता। वे बड़ी आत्मीयता से मुझे रोकते और घर से चाय मंगवा कर पिलाते। बातचीत के दौरान हम आपबीती-जगबीती के अलावा राजनीति की बात भी करते और इस तरह से आधे-पौन घंटा हमारा गपशप में निकल जाता। वे अंगरेजी भी उम्दा किस्म की बोलते थे। जाने क्यों उनसे बातचीत के दौरान मुझे अक्सर लगता कि वे कोई खास बात मुझसे कहना चाहते हैं, जो वे कह नहीं पा रहे हैं। आखिर एक दिन उन्होंने मुझसे कह ही दिया- ‘कॉलेज में कोई कार्यक्रम रखवाओ न! और उसमें मुझे मुख्य अतिथि बनवाओ। यहां इस दुकान में बैठे-बैठे मन उकता जाता है। कार्ड छपवाओ, पुरस्कार दो, अच्छे नाश्ते-पानी का प्रबंध करो, पैसे मैं दे दूंगा। हां, अखबार में नाम जरूर छपना चाहिए मेरा।’

मुझे याद है मैंने प्राचार्यजी से अनुमति लेकर कॉलेज में स्टाफ और विद्यार्थियों के बीच एक मैत्री-क्रिकेट मैच रखवाया जिसके मुख्य अतिथि इनको बनाया। उन्होंने अपने सारे वादे पूरे किए। सोचता हूं क्या वास्तव में नाम पैसे से बड़ा है या फिर पैसा नाम से? या फिर दोनों?
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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