तवलीन सिंह ने अपने लेख ‘मानसिकता पर सवाल’ (12 जुलाई) में वामपंथ की आलोचना करने में यहां तक कह दिया कि केरल में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा समाज में कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है। मैं यह नहीं समझ पाता हूं कि इतिहास पढ़ने-पढ़ाने वाले लोग इतिहास के साथ छेड़छाड़ क्यों करते हैं? भारत के संदर्भ में बार-बार मुगलकाल के इतिहास के कुछ एक बुरे अनुभवों को संदर्भित कर उसकी अन्य सारी अच्छाइयों पर धुत दक्षिणपंथ में डूबे कुछ लोग परदा डालने की कोशिश करते हैं।

अपने लेख में तवलीन सिंह ने ऐसा ही एक कार्य किया है। यह तो उन्हें पता होना चाहिए कि जिस समय मुगल इस देश पर राज कर रहे थे उस समय भारत की जीडीपी समूचे विश्व की जीडीपी का पचीस प्रतिशत हुआ करती थी। इस जीडीपी में तब की हिंदू बहुल जनसंख्या का क्या कोई योगदान नहीं था? क्या ढेरो मुगल शासकों द्वारा हिंदुओं पर लगाया जाने वाला जजिया कर माफ नहीं किया गया?

क्या अकबर भारत में व्याप्त हिंदू-मुसलिम मतभेदों से चिंतित नहीं था, जो उसने एक दीन-ए-इलाही नामक धर्म की स्थापना की? मुझे तो इस दक्षिणपंथ के सोच पर आश्चर्य होता है कि मुगल शासकों को सदैव इस्लाम की कसौटी पर रख कर ही परखा जाना चाहिए। क्या आपको नहीं पता कि जहांगीर की मां जोधाबाई जो राजा भारमल की बेटी थी, एक हिंदू थी?

लेकिन आपको इन सबसे क्या। आप लोग तो मनुस्मृति के उन्हीं श्लोकों को आज भी मानने और चरितार्थ करने वाले लोग हैं, जो यह कहता है कि स्त्रियां धर्मरहित होती हैं, और यही कारण है कि दक्षिणपंथ में डूबे लोग मुगलकाल को केवल इस्लामिक नजरिए से ही देख सकते हैं। इसमें उन्हें गंगा-जमुनी संस्कृति दिख ही नहीं सकती।

रही बात अमर्त्य सेन की तो आप सभी को निस्संदेह गुजरात और केरल के विकास के उन सभी बिंदुओं पर गौर करना चाहिए, जो इन दोनों राज्यों ने विकास के भिन्न-भिन्न चरणों में हासिल किए हैं? शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन से जुड़े सभी बिंदुओं पर केरल का अग्रणी होना निश्चित रूप से अमर्त्य सेन की इस बात को बल प्रदान करता है कि विकास का केरल मॉडल गुजरात मॉडल से बेहतर है।
(हेमंत गुप्ता, लखनऊ)

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