सामान्य तौर पर समाज में भलमनसाहत की इज्जत है और इसीलिए यदा-कदा घटित होने वाली नकारात्मक घटनाओं के बावजूद कायम है और हमेशा रहेगी। भले ही नकारात्मक घटनाएं कभी-कभार ही क्यों न होती हों, पर वे लोगों के भरोसे को तोड़ने का काम तात्कालिक और अल्प समय के लिए तो करती ही हैं। यह हमारी खुशकिस्मती है कि नकारात्मक घटनाएं स्थायी प्रभाव नहीं डालतीं। ‘दान की आंखें कचरेदान में’ (जनसत्ता, 12 जून) की खबर अपवाद होते हुए भी झकझोरने के साथ-साथ सकारात्मकता और भरोसे को गहरा आघात लगाने वाली भी है।
खबर के अनुसार ग्वालियर के जया आरोग्य अस्पताल के कचरे में वे बेशकीमती आंखें मिलीं, जिन्हें गंभीर परिवार ने अपनी दिवंगत माताजी की आंखें किसी जरूरतमंद को रोशनी देने के लिए दान दी थीं। अस्पताल के कर्मचारियों की एक लापरवाह घटना ने जहां एक जरूरतमंद इंसान की रोशनी छीनी, वहीं गंभीर परिवार की भावनाओं के साथ अमानवीय क्रूरता की हदें पार कर दीं। साथ ही समाज का भरोसा तोड़ने की कोशिश भी की है।
जानकारी के अनुसार गंभीर परिवार द्वारा किए गए नेत्रदान का क्या हुआ, यह पता करने के लिए स्थानीय अखबार के संवाददाता और छायाकार ने जांच में पाया कि दान में दी गई आंखें कचरे के हवाले कर दी गर्इं। जिन डॉक्टरों को समाज भगवान मानता है, उन पर शक होने से इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी घटनाएं पहले न घटी हों। मीडिया में खबर आने के बाद लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किया तब प्रशासन हरकत में आया और संभाग आयुक्त ने दो डॉक्टरों और नर्स को निलंबित कर जांच के आदेश दिए। जब तक जांच के परिणाम आएंगे तब तक इस घटना की याद कमजोर हो चुकी होगी। संभव है दोषी कर्मचारियों को सजा भी मिल जाए, जो मिलना भी चाहिए, जो दूसरों के लिए सबक के काम आए। मामले को उजागर करने वाले अखबार के संवाददाता और छायाकार साधुवाद के पात्र हैं, उन्हें सरकार करे या न करे समाज पुरस्कृत करे तो अच्छा होगा।
यह मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा गंभीर मामला है, इसलिए प्रशासकीय कार्रवाई के साथ इसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझ कर अधिक स्थायी निदान की दरकार है। दिनोंदिन बाजार की गिरफ्त में आते जा रहे समाज में समूची शिक्षा सहित चिकित्सा शिक्षा को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाने की जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है और आगे बढ़ती ही जाएगी। पूंजीवादी विकास में इंसानी जज्बात कम होते ही जाते हैं। इसलिए प्रेम, सद्भावनाओं, दया, ईमान, और इंसानी जज्बात की दौलत को बनाए रखना और उसे मजबूत करते रहने के सिवाय और कोई विकल्प हो सकता है क्या?
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल
फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta