प्रधानमंत्री मोदी की बहुप्रतीक्षित चीन यात्रा शुरू हो गई है और इसके नतीजों को लेकर कयासबाजी का दौर जारी है। ‘मेक इन इंडिया’ संबंधी उत्साह उफान पर है। लेकिन यहां हमें नहीं भूलना चाहिए कि जब कोई चीनी मंत्री ‘मेड इन इंडिया’ और ‘मेड इन चाइना’ के विलय करने के बारे में बात करे तो इसका मतलब है कि उन्होंने सभी संभावनाओं को खंगाल लिया है और निवेश की योजना भी बना ली है। हालांकि प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि हमने दस माह के भीतर पड़ोसी देशों से जैसे रिश्ते सुधारे यूपीए सरकार तो दस सालों में भी नहीं सुधार सकी। जी हां, तभी तो मोदीजी ने एक साल के भीतर ही लगभग सारे विश्व की यात्री कर ली और 14 मई से चीन यात्रा पर हैं। अब फोकस चीन से संबंधों और निवेश पर है।
यहां गौरतलब है कि चीन के (सीडीबी) बैंक ने पहली बार दस अरब डॉलर का कर्ज रिलायंस कम्यूनिकेशन को दिया। उसके बाद कई भारतीय कंपनियों को कर्ज दिया। सबसे बड़ा सौदा मशीनों को लेकर हो सकता है। चीन ने मशीनों के नवीनीकरण के साथ ही, जो लोग उनकी कीमत नहीं चुका सकते उन्हें उधार देने की भी पेशकश की है। यह भी ध्यान रहे कि चीन में बनी मशीनें जापान, जर्मनी या अमेरिका में बनी मशीनों से 40-70 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं।
पिछले कुछ सालों में भारत की तीन-चौथाई नई बिजली परियोजनाएं और लगभग सभी निजी बिजली कंपनियां चीनी जेनरेटरों का इस्तेमाल करती हैं। भारत की बिजली की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए चीन उसे इससे जुड़ी और भी मशीनें बेचना चाहता है। चीन की अर्थव्यवस्था उसे लगे हालिया झटके से उबरने के लिए बेचैन है। पिछले कुछ सालों में चीन की विकास दर 10-11 प्रतिशत से फिसल कर सीधे 7.5 प्रतिशत पर आ गई है। ज्यादातर चीनी कंपनियां निर्यात में कमी के संकट से जूझ रही हैं। दक्षिण चीन के ज्यादातर कारखाने सिमटते बाजार के साथ ही कच्चे माल और मजदूरी की बढ़ती लागत के दबाव में हैं। नतीजतन, चीन अब भारत और वियतनाम जैसे देशों को सामान बेचने की नीति बदल कर सीधे कारखाने ही बेचना चाहता है।
सालों की बचत की वजह से चीन के पास नगद मुद्रा भंडार भी काफी है। चीन के बैंक और सरकारी एजेंसियां विदेशी उद्यमों में निवेश को तैयार हैं। चीन को अपनी मशीनों और निवेश के लिए विदेशी बाजार चाहिए। भारत उसके लिए सबसे मुफीद देश है क्योंकि दोनों देशों की जरूरतें कमोबेश पूरक हैं। लेकिन चीन का निवेश स्वीकार करने में कुछ गंभीर खतरे भी हैं। इनमें से एक है मशीनों के कल-पुर्जों के लिए चीन पर निर्भर हो जाने का खतरा। बिजली उद्योग के लिए यह बड़ी चिंता रही है। दोनों देशों के संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। ऐसे में कल-पुर्जों की कमी से बिजलीघरों के ठप होने की आशंका बनी रहेगी। आलोचकों का कहना है कि कई चीनी कंपनियां वही मशीनें भारत को देंगी जिन पर प्रदूषण की वजह से चीन में प्रतिबंध है। दरअसल, बीजिंग स्थित ग्लोबल टाइम्स ने यह कह कर पहले ही शंकाओं का पिटारा खोल दिया है कि भारतीयों को ‘सेकेंड हैंड’ मशीनों को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि विकासशील देश की औद्योगिक क्षमताएं ऐसे ही बढ़ती हैं।
शुभम गुप्ता, दिल्ली
फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta