विकसित देश अपने ऐतिहासिक स्थलों, दस्तावेजों, पुरानी कलाकृतियों और सांस्कृतिक धरोहरों को पूरी संवेदनशीलता के साथ सहेजने का जतन करते हैं। लेकिन हमारे यहां धरोहरों के प्रति लोगों में वैसी संवेदनशीलता विकसित करने के प्रयास तो दूर, खुद पुरातत्त्व विभाग उन्हें उपेक्षित छोड़ देते हैं। संग्रहालयों में रखी ऐतिहासिक महत्त्व की वस्तुओं की साज-संभाल न होने से वे नष्ट या धुंधली हो जाती हैं।
यह किसी से छिपा नहीं है कि दिल्ली के मुगलकालीन और उससे पहले के भी अनेक ऐतिहासिक स्थलों पर लोगों ने कब्जा करके या तो उन्हें अपने रहने का या फिर कारोबारी ठिकाना बना लिया है। बहुत सारे पुराने तालाबों-कुओं-बावड़ियों आदि को नष्ट करके उन पर भवन खड़े कर लिए गए हैं। राजधानी दिल्ली में कुतुब मीनार के पास वाले इलाके और तुगलक के किले आदि में बने मकान सहज देखे जा सकते हैं। कई जगहों पर, जहां भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की जमीन होने का एलान करते बोर्ड लगे थे, भवन निर्माताओं ने मकान-दुकान आदि बना कर लोगों को बेच दी और वहां बस्तियां बस चुकी हैं।
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह सब प्रशासन की जानकारी में नहीं होगा। अतिक्रमण का सिलसिला क्यों चलता रहा, कार्रवाई क्यों नहीं हुई? ऐसे स्थलों पर बेजा कब्जा करने वाले या तो ऊंची पहुंच वाले लोग होते हैं या प्रशासन से सांठगांठ करके अपना स्वार्थ साधते रहते हैं। अदालत का दरवाजा खटखटा कर ऐतिहासिक स्थलों को मुक्त कराने के प्रयास किए जाने चाहिए। क्या इस मामले में सरकार की नींद टूटेगी, और क्या धरोहरों को बचाने और उनके संरक्षण का नागरिक बोध पैदा होगा।
अनिल धीमान, तुगलकाबाद, दिल्ली
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