शास्त्रों में पढ़ा था कि योग चित्तवृत्ति को नियंत्रित करता है। लेकिन जब योग के कई सूरमाओं को गलत गतिविधियों में लिप्त पाया तो आज तक नहीं समझ सका कि आखिर योग किस तरह की चित्तवृत्ति को नियंत्रित करता है? कुछ समय पहले आसाराम बापू जो नित्यनैमित्तिक योग करते थे, उन्होंने भी योग की प्रशंसा की थी। जबकि सबको पता है कि वे पचहत्तर वर्ष की आयु में पोती की उम्र की बच्ची के यौन शोषण के आरोप में जेल में बंद हैं और जांच एजेंसी को अपने ‘नार्को टेस्ट’ की अनुमति न देकर उन्होंने खुद ही साबित भी कर दिया कि उनके ऊपर लगा आरोप गलत नहीं है।

ठीक है, योग की महिमा से इस आयु तक ‘युवा’ बने रहना संभव है, लेकिन इस तरह की हरकत क्या योग-आचरण सम्मत है? यदि नहीं, तो आखिर चित्तवृत्ति पर नियंत्रण क्या है? ऐसे ही काले धन के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले एक संन्यासी बाबा को अपने मित्र से यह कहते हुए टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन में करोड़ों लोगों ने सुना-देखा होगा कि ‘कालेधन का प्रयोग कैसे करें, यह बंद कमरे में करने की बात होती है’।

जिसका हम विरोध करते हैं स्वयं उसी कार्य को अपने चित्त में रख उसे करने की इच्छा प्रकट करते हैं तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता। हमें योग के जरिए अपने चित्त का भी परिष्कार करना चाहिए।
आमोद शास्त्री, दिल्ली

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