आडवाणीजी को डर है कि आपातकाल की स्थिति फिर से बन सकती है क्योंकि लोकतंत्र का गला लगातार घोंटा जा रहा है। अफसोस है कि इतने वरिष्ठ नेता को आज अपनी ही पार्टी के सत्ताधारियों पर विश्वास नहीं है। बहरहाल, खुशी की बात है कि कम से कम यह सच सामने तो आया।

अगर यह सामने न आता तो कुछ लोग समझ ही नहीं पाते कि सामाजिक संगठनों पर रोक, अभिव्यक्ति पर अंकुश और सरकार की शक्तियों का केंद्रीकरण ही आपातकाल जैसी स्थिति को जन्म देते हैं। इसीलिए हमें ध्यान रखना होगा कि जिन्हें सत्ता सौंपी है वे सेवक बने रहें और इंदिरा या हिटलर न हो जाएं।
तरुण चुघ, गुड़गांव

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