इंटरनेट की स्वच्छता, शालीनता और पवित्रता एक मुख्य शत्रु वायरस है। वायरस को नियंत्रित करने के लिए एंटीवायरस बनाया गया। जिन कंप्यूटरों में एंटीवायरस सॉफ्टवेयर नहीं होता है उनमें इंटरनेट से वायरस आ जाता है। वायरस के कारण वह कंप्यूटर अटक-अटक कर चलता है और झुंझलाहट पैदा करता है।
दूसरी समस्या यह भी है कि जब इंटरनेट पर किसी वेबसाइट पर क्लिक करते हैं तो एक साथ कई साइट्स बिना इजाजत के खुल जाती हैं, जिन्हें पॉप-अप कहते हैं। एक तो ये फर्जी साइट्स इंटरनेट चैनल को काम में लेकर वांछित साइट्स की स्पीड को कम करती हैं और ऊपर से इनमें अश्लील सामग्री भी आती है। इस वजह से बहुत से मां-बाप अपने बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना चाहते हैं। यहां तक कि स्कूलों, दफ्तरों व अन्य सार्वजनिक कंप्यूटरों पर इंटरनेट चलाने वाले लोगों के मन में एक भय बना रहता है कि कहीं इंटरनेट पर कुछ उलटा-सीधा खुल गया तो?
अगर कंप्यूटर में खरीदा हुआ एंटीवायरस डाल लेते हैं तो जहां कंप्यूटर की स्पीड सही रहेगी, डाटा सुरक्षित रहेगा और कंप्यूटर की उमर भी लंबी रहेगी। दूसरा, इंटरनेट अब सुरक्षित हो जाएगा। अब न तो कोई पॉप-अप विंडो खुलेगी और न बिना इजाजत के कोई ऐसा-वैसा पेज। तो फिर लोग एंटीवायरस क्यों नहीं खरीद लाते? किसी अच्छे एंटीवायरस की एक साल की कीमत एक हजार रुपए रुपए के आसपास होती है। एक आम इंसान एक सॉफ्टवेयर के इतने पैसे नहीं देना चाहता है क्योंकि वह उस कंप्यूटर से कोई कंपनी तो चलाता नहीं है।
इसके मद्देनजर यदि सरकार देश में सूचना प्रौद्योगिकी की सुरक्षा और विश्वसनीयता की जिम्मेदारी समझ कर स्वयं एंटीवायरस बनाने का दायित्व वहन कर ले तो डिजिटल इंडिया मिशन का सही फल देश की जनता को मिल जाएगा। अगर यही एंटीवायरस भारत सरकार अन्य देशों के लोगों को भी फ्री में काम में लेने के लिए दे तो दुनिया में भारत के नाम का डंका बजेगा ही।
राज सिंह रेपसवाल, सिद्धार्थ नगर, जयपुर
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