जिस तरह से विदेशों में हिंदी के प्रति रुचि जागी है, वह सुखद है। पाकिस्तान में भी हाल ही में पहली बार एक छात्रा को हिंदी की उच्च डिग्री प्रदान की गई। पर अपने देश में हिंदी के लिए हम क्या कर रहे हैं?

यहां तो आलम यह है कि हिंदी बोलने वालों को अंगरेजी बोलने वालों के मुकाबले कमतर आंका जाता है। लोग अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाने के बजाय कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। हर जगह अंगरेजी का बोलबाला है।

मीडिया भी इससे बचा नहीं है। असल में हिंदी भाषी ही हिंदी का गला घोंट रहे हैं। हिंदी दिवस पर औपचारिकता के बजाय कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे लगे कि वाकई में हिंदी के लिए कुछ हुआ है।
’कफील अहमद फारूकी, नोएडा</p>