अपूर्वानंद का लेख ‘औसतपन को पोसती सत्ता’ (एक अगस्त) पढ़ा। उनके मुताबिक विविधता से घबराने का कारण अपनी श्रेष्ठता में पूर्ण विश्वास का न होना है। वे औसतपन को गरियाते हुए उसमें ‘आक्रामकता’, ‘श्रेष्ठता के प्रति घृणा’ और ‘अपने प्रति हीनता बोध’ देखते हैं। सवाल है कि श्रेष्ठता और औसतपन को हमें कैसे देखना चाहिए? गजेंद्र चौहान की पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में नियुक्ति को यहां तक नहीं खींचा जाना चाहिए कि समाज का औसतपन ही घटिया दिखने लगे।

देश-समाज को बनाने वाले करोड़ों लोग औसत दिमाग ही होते हैं। इंजीनियर जिस इमारत का नक्शा बनाता है जान पर खेल कर मजदूर उसे तामीर करते हैं। पर इससे दोनों का महत्त्व कम नहीं होता। श्रमिक कभी-कभी आक्रामक इसलिए हो जाते हैं कि उन्हें जान पर खेलने के अपने ‘रिस्क’ का उचित मोल नहीं मिलता।

औसत दिमागों में श्रेष्ठ लोगों के प्रति आदर और घृणा दोनों तरह के भाव पाए जाते हैं। जरूरी नहीं कि उनमें ये भावनाएं अपने प्रति हीनता बोध के कारण हों। गांधीजी और भगत सिंह जैसे श्रेष्ठ लोगों के प्रति औसत जनता के मन में श्रद्धा थी और है। उनकी श्रेष्ठता सामान्य जन के मन में आत्म गौरव की भावना जगाती थी। यह त्याग और समाज के प्रति समर्पण से पैदा हुई श्रेष्ठता थी। लेकिन मौजूदा राजनीतिकोंके प्रति लोगों के मन में डर या घृणा के भाव अधिक हैं।

औसतपन और श्रेष्ठता का रिश्ता उनके सरोकारों और अभ्यासों से भी बनता-बिगड़ता है। जहां श्रेष्ठता औसतपन की चिंता करती है वहां वह अपने औसतपन की दूरी को कम करने का अभ्यास करेगी। एक समरस समाज में श्रेष्ठता औसतपन की घनीभूत उच्चता होनी चाहिए। पर विषम और वर्गीय समाज में औसतपन से उसका रिश्ता बदल जाएगा। यह देखा गया है कि ऐसे समाजों में श्रेष्ठताएं खुद सत्ता के पक्ष में खड़ी हो जाती हैं। ऐसे में औसतपन श्रेष्ठता से घृणा करता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है।

हमारे तंत्र में योग्यता दो मापकहैं-ज्येष्ठता और श्रेष्ठता। आइएफटीआइ के शीर्ष पद के लिए दोनों में से एक तो जरूरी है ही। फिल्म विभिन्न कला रूपों का आधुनिक समुच्चय है। अच्छा होता गजेंद्रजी इसका कुछ और अनुभव लेकर इस संस्थान में आते।
’मदन मोहन पाण्डेय, तपोवन रोड, देहरादून

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