प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में एक बहुत संवेदनशील मुद्दा उठाया और वह था अन्न की बबार्दी रोकने व कम करने का। हम एक ऐसे देश के वासी हैं जो कृषि प्रधान है। एक किसान हर परिस्थिति में चाहे वह हाड़ कंपाने वाली ठंड हो या जला देने वाली भीषण गर्मी, बिना परवाह किए अनाज उगाता है और हमारा पेट भरता है। अन्न के एक भी दाने की बर्बादी उस किसान की मेहनत का अनादर है, उसी देश में एक साल में इतना अन्न बर्बाद जाता है जिससे ब्रिटेन जैसे देश के लोगों का पेट भरा जा सकता है। क्या हमारे लिए यह शर्म की बात नहीं? हम हर चीज के लिए किसी न किसी को दोषी ठहरा देते हैं, पर इस बर्बादी के लिए किसे कुसूरवार ठहराएंगे? सरकार को, अफसरों को या किसी और को? शायद इस प्रश्न का जवाब हम में से किसी के पास नहीं।
क्यों हम इस पहल का हिस्सा नहीं बन सकते? इसके लिए किसी के साथ की जरूरत नहीं, जरूरत है तो बस इच्छाशक्ति की। हम सिर्फ इतना सोच लें कि अपनी थाली में उतना ही खाना लें जितना खा सकते हैं। गृहणी यह सोच ले कि आज खाना उसे कचरे की बाल्टी में नहीं डालना है, उतना ही पकाए जितनी जरूरत हो। हम शादी समारोह या पार्टियों में जाते हैं। वहां न जाने क्या-क्या थाली में भर लेते हैं, और उसमें से आधा कूड़ेदान में ही जाता है। हमारा सिर्फ एक निश्चय कि आज हमें खाने का एक भी दाना कचरे में नहीं डालना है, अन्न की बबार्दी को रोक सकता है।
हर धर्म में अन्न को देवता तुल्य माना गया है। हर जगह हम उम्मीद करते हैं कि अगर ये परिवर्तन होगा तो बदलाव आएगा। आज क्यों न हम सब लोग यह मुहिम शुरू करें कि हम अन्न की बबार्दी रोकने की इस अच्छी पहल का हिस्सा बनेंगे। हम अपने स्तर पर अन्न की बबार्दी नहीं होने देंगे, उतना ही भोजन थाली में लेंगे जितना हम खा सकते हैं। एक आसान-सी लेकिन महत्त्वपूर्ण बात सबसे साझा करने के लिए प्रधानमंत्री को साधुवाद।
’शिल्पा जैन सुराणा, वरंगल, तेलंगाना
चौपालः अन्न की बर्बादी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में एक बहुत संवेदनशील मुद्दा उठाया और वह था अन्न की बबार्दी रोकने व कम करने का।
Written by जनसत्ता

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First published on: 03-04-2017 at 03:35 IST