संपादकीय ‘दलित की बरात’ (14 मई) पढ़ा। दलित युवक की बरात में पत्थरबाजी या दूल्हे को घोड़ी पर न बैठने देने की ये फुटकर घटनाएं नहीं हैं। यह समाज की रीढ़ में छेद कर उसमें जातीय वर्चस्व की अंकुशी लगाने वाली ‘अचेतन’ कील है। हमें समझना होगा कि भारत में जातीयता एक दंभ और अहंकार का कॉकटेल तैयार कर वर्गीय-संघर्ष को सदैव दावतखाने पर न्योतती है।
इसके पीछे सामंती मानसिकता के विषाणु-कीटाणु हैं जिसे भारतीय समाज ने कथित पुरोहितवादी ढकोसलों के आधार पर गढ़ा है, पोसा-पाला और निवाला बना कर गटका है। आरक्षण-देवता का एक आनुदानिक प्रपंच खड़ा कर अपनों को अपने से अलगा दिया है। आरक्षण के बहाने पूरे देश में राजनीतिक षड्यंत्र फल-फूल रहा है; बौद्धिक-संयंत्र प्रयोगशील है, जो मानता है कि किसी को योग्य बनाने से अच्छा है कि उसे ‘प्रतिभाशाली’ होने का सर्टिफिकेट थमा दो, लेकिन उसमें कबीर के कथनानुसार ज्ञान, क्रिया और इच्छा के हुनर-कौशल, काबिलियत, साहस और संकल्पशक्ति न पनपने दो।
हद है, आदमी घोड़े पर नहीं चढ़े क्योंकि वह दलित है; दूध-भात न खाए क्योंकि वह निम्न जाति का है; एक ही शौचालय का प्रयोग न करे क्योंकि वह अछूत है! वाह भाई, कबूतर का ‘क’ नहीं जानते पर सामाजिक ठेकेदारी की कबूतरबाजी या करतब सीखना हो तो आपसे सीखेंं! परले दरजे का बेवकूफ होते हुए भी आपको सिर्फ इस नाते दंडवत करें कि आप अमुक जाति, वंश या बिरादर के हैं।
समाजविज्ञानी, भाषाविज्ञानी, मनोविज्ञानी, नृतत्त्वविज्ञानी, संचारविज्ञानी आदि विशेषणों से अलंकृत भारतीय बौद्धिको…क्या कहना है आपका इस पर? विश्वविद्यालयी प्राध्यापको, क्या कहता है आपका अनुसंधान, शोध-पत्र? किन मूल कारणों का खुलासा करती हैं इस संदर्भ में आपकी पत्रिकाएं या कि ‘इंपेक्ट फैक्टर’ वाला अंतरराष्ट्रीय जर्नल? क्यों दुहराव-भरी ऐसी घटनाओं से हम और हमारा समाज दो-चार है? क्यों ऐसी अमानुषिक मनोवृत्तियां सर उठा ले रही हैं प्राय:?
जाहिरा तौर पर भारत में आज दो वर्ग हैं: नाागरिक समाज और सनातन भारतीय। सनातन भारतीय के हिस्से में आजादी के परखच्चे उड़ाने वाली सचाइयां हैं। इस वर्ग के लोग आर्थिक चिंता से ग्रस्त हैं तो युवा पीढ़ी दोराहे पर है। खुदकुशी, अपराध, लूट, हिंसा, बलात्कार, जुआ, शराबखोरी, नशाखोरी, गाली-गलौज, बेशहूर शोहदेबाजी, उत्तेजनापूर्ण प्रतिक्रिया, असामाजिक बर्ताव, अराजकतावादी रवैया आदि-आदि के कसूरवार के रूप में उन्हीं के नाम पर सरकारी मुहर लगी है।
वर्तमान अर्थयुग में उन पर कुछ भी आरोप मढ़ कर या आक्षेप लगाकर छोड़ दो, बस काम हो गया। उनकी बोलती बंद कर दो, कोई हिसाब लेने नहीं आएगा। गोकि गरीब आदमी सरकार चाहता है और बदल देता है लेकिन अपनी किस्मत बदल पाना उसके अपने हाथ में नहीं है।
सरकार कहती है, नरेगा कमाओ, मनरेगा कमाओ। प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह पिछली सरकार के किए-धरे और बोए का कर्मफल है, इसे मैं समाप्त नहीं सकता। इसलिए मौजूदा जनतांत्रिक दुर्भावना और आर्थिक असहयोग का शिकार सभी जातियां, मजहब और समुदाय एकसमान हैं। दरअसल, हमें लड़ना उन ताकतों से है जो हमारा घर-बार चौपट कर रही हैं, हमारे उद्योग-धंधे खत्म कर रही हैं। लेकिन हम लड़ रहे हैं घोड़े पर चढ़े दूल्हे के साथ, सिर्फ इसलिए कि यह झूठी शान और जातीय श्रेष्ठताग्रंथि से रोगग्रस्त समाज को चिढ़ा रहा है।
बावजूद इन सबके सामाजिक-जन को भरोसा है कि अपने ही किए सुधार और अपेक्षित बदलाव होंगे। हम-आप ही बुराइयों का खात्मा करेंगे। हम लोग ही समाज की गलतियों को आईना दिखाएंगे। गोया सरकार और सरकारी-तंत्र से यह उम्मीद करना कि वह स्वत:स्फूर्त समाज-सुधार करे या लोगों को विवेकी बनाए, अब संभव नहीं रहा। लेकिन यह भी सत्य है कि यदि सरकारी-तंत्र हमारी प्रेरणाशक्ति से चेतजाए तो बड़ी से बड़ी घटना तत्काल टल सकती है। हिंसा-वारदात की बढ़ती घटनाओं पर नकेल कसा जा सकती है। स्त्रियां पुरुषवादी यातना की शर्मसार कर देने वाली करतूतों का शिकार होने से बच सकती हैं।
राजीव रंजन प्रसाद, बीएचयू, वाराणसी</strong>
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