हिंसा और सजा कभी उचित नहीं मानी जातीं लेकिन विवश होकर रक्षा और भावी खतरे की दृष्टि से इन्हें अपनाना ही पड़ता है। विद्वानों के मतानुसार यदि आप शांति चाहते हैं तो युद्ध के लिए तैयार रहें। स्कूल और परिवार में भी अक्सर इनका प्रयोग होता रहा है जो गलत नहीं है क्योंकि यदि हम बच्चों को उनकी गलतियों पर डांट-डपट और दंडित नहीं करेंगे तो वे निरंतर इन गलतियों से बर्बाद ही हो जाएंगे।

शिक्षा-शास्त्रियों ने भी दंड और पुरस्कार का शिक्षा में भी शुरू से ही विधान किया है जो बिलकुल तर्कसंगत है। मगर आज वोट और तुष्टिकरण की राजनीति ने दंड व्यवस्था को स्कूलों से हटा कर शिक्षा को चौपट ही कर दिया है।

आज बच्चे ही शिक्षक पर चाक तक फेंकने लगे हैं। यहां सजा का यह अर्थ नहीं कि शिक्षक जल्लाद ही बन जाए। उचित सजा ही वाजिब होती है जिसमें कोई मानसिक और शारीरिक हानि न हो।

वेद मामूरपुर, नरेला

 

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