विश्वविद्यालयों में चयन आधरित क्रेडिट पाठ्यक्रम लागू किए जाने की वजह से न सिर्फ हिंदी का गला घोंटा जा रहा है बल्कि उसे दोयम दरजे की स्थिति में पहुंचा दिया गया है। अब हिंदी को अनिवार्य विषय की बजाय एक वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा।

स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले बीए पास में हिंदी तीन वर्ष पढ़ाई जाती थी और बी कॉम सहित सभी आॅनर्स में वर्ष भर पढ़ाई जाती थी। अब बदली हुई परिस्थिति में अंगरेजी मुख्य और अनिवार्य विषय हो गई है और हिंदी वैकल्पिक हो गई है। क्या यह हास्यास्पद स्थिति नहीं है?

दो साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में चार वर्षीय पाठ्यक्रम लागू किया गया था तो विभिन्न संगठनों ने ताल ठोककर विरोध किया था। नतीजतन, उस पाठ्यक्रम को पिछले वर्ष वापस ले लिया गया और फिर से पुरानी व्यवस्था को लागू कर दिया गया था।

मजे की बात है कि चार वर्षीय पाठ्यक्रम में भी हिंदी की उपेक्षा नहीं की गई थी और वह एक अनिवार्य विषय के रूप में थी। लेकिन आज सीबीसीएस वाले पाठ्यक्रम में हिंदी को ताक पर रख दिया गया है तो कोई भी संगठन विरोध दर्ज नहीं कर रहा है। कहीं से विरोध की आवाज आ भी रही है तो उस अंदाज में जिसे धूमिल कहते हैं कि ‘हाथ भी उठा रहे और कांख भी न दीखे’।

महादेवीजी का कथन है- ‘सब चीजें तो बाजार-हाट में मिल जाती हैं, पर सपने भारी से भारी कीमत देने पर भी नहीं मिलते। सपने खो जाते हैं, फिर कभी वापस नहीं मिलते। सपनों को खो जाने के साथ, सपनों को देखने वाला भी कहीं गुम हो जाता है, सपने देखने वाली उम्र ही ओझल हो जाती है। सपने केवल आशा नहीं होते, वे भविष्य का आलोक भी होते हैं।’ यह बात कौन समझाए उन मठी किस्म के अध्यापकों को जो कॉपी जांचने में, सभा-संगोष्ठियों में, टीवी स्टूडियो में दरबारी किस्म के नेताओं की मंडली में शामिल होने की जुगत भिड़ाते रहते हैं।

हिंदी को पहनते-ओढ़ते, बिछाते हैं लेकिन उसके लिए कुछ नहीं करते। यहां खलील जिब्रान की पंक्ति याद आती है- ‘लानत भेजो उस राष्ट्र पर / जिसके नेता लोमड़ी जैसे चालाक हों / जिसके दार्शनिक मदारी हों / जिसकी कला पैबंद और भौंडी नकल मात्र! / करुणा करो उस देश पर / जो सपनों में जिस चीज से नफरत करता है/ जाग्रत अवस्था में उसी के आगे सिर झुकाता है।’
’बालेंद्र कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय

पाक की हरकतें
तमाम शांति वार्ताओं और अमन के हजारों संदेशों के बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। जिहाद के नाम पर मासूमों को बरगला कर उन्हें भारत के विरुद्ध हथियार उठाने के लिए तैयार करना उसके लिए आम बात है। इस तरह के मसले सामने आने पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिन ठोस कदमों को उठाने की जरूरत आज है वे कहीं नजर नहीं आते। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो पाकिस्तान आतंकियों का निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश बन जाएगा। तब हम उसकी हदें निश्चित करना तो दूर, उसे हदें समझा भी नहीं पाएंगे।