जाहिद खान का लेख ‘ताकि प्राथमिक शिक्षा में सुधार आए’ (22 अगस्त) वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सुधार की अपार संभावनाओं के विविध पहलुओं को उजागर करता है। तमाम सरकारी शिक्षा और अन्य संस्थाओं की बदहाली सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता का नतीजा है। सिर्फ शिक्षा की बात क्यों की जाए! नागरिक सुविधा के नाम पर सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत यह बताने के लिए काफी है कि हमारे देश में आम लोगों के बुनियादी हक की चिंता किसी को नहीं है। यदि समय रहते इन समस्याओं पर ध्यान दिया जाता तो सरकारी संस्थान बद से बदतर की स्थिति में जाने से बच जाते।

सरकारी संस्थाओं को चलाने वाले जितनी सक्रियता कागजी रिकार्ड जुटाने में दिखाते हैं उतनी अपनी ड्यूटी पूरी करने में नहीं। मेरे समय के सरकारी स्कूलों की स्थिति इतनी दयनीय नहीं थी जितनी आज दिखाई दे रही है। उस समय निजी स्कूलों का इतना वर्चस्व नहीं था। शायद इसीलिए सरकारी स्कूलों में पढ़ाने से हैसियत छोटी नहीं हो जाती थी।

धीरे-धीरे निजी स्कूलों के बढ़ते जाल ने सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लील लिया। इसके बहुत-से कारण हो सकते हैं। मसलन, बढ़ती आबादी के अनुपात में बुनियादी सुविधाओं से संपन्न पर्याप्त स्कूलों का न होना, शिक्षा अनुदान में बढ़ोतरी न करना, समय पर स्थायी शिक्षकों की नियुक्तियां न होना, और सबसे जरूरी सामाजिक नैतिकताओं में लगातार गिरावट आने से शिक्षक और शिक्षा का व्यापार या बाजार के अनुकूल संचालित होने को विवश होना।

विद्यार्थी के मूल्यांकन की पद्धति में उदारता बरतने का परिणाम यह है कि आठवीं कक्षा तक उसमें गंभीरता दिखाई नहीं देती और उसकी प्राथामिक शिक्षा की नींव कमजोर रह जाती है। लोकतंत्र में जब तक तंत्र और लोक में सामंजस्य नहीं होगा तब तक न तंत्र दुरुस्त हो सकता है और न लोक संतुष्ट।

लोक की सरकारी तंत्र के प्रति उपेक्षा ने ही सरकारी तंत्र को नाकारा बनाया है। ऐसे में इलाहाबाद हाइकोर्ट के हस्तक्षेप से सरकारी स्कूलों में हो रही लापरवाही पर अंकुश लगाया जा सकता है। यदि कोर्ट के आदेशों का मुस्तैदी से पालन किया जाए और सरकारी अफसरों / कर्मचारियों के सरकारी संस्थाओं की सेवाओं से जुड़ने की अनिवार्यता लागू कर दी जाए तो सिर्फ उत्तर प्रदेश नहीं, देश के तमाम सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की तस्वीर ही बदल जाएगी।

विभा ठाकुर, रोहिणी, दिल्ली

 

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