भारतीय राजनीति में फैली दुर्गंध साफ करने के कितने भी दावे क्यों न कर लिए जाएं, राजनीति है ही ऐसी कि साफ करने की बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को भी अपने रंग में रंग लेती है।

यही हाल बिहार में दिखाई पड़ रहा है। राज्य में अक्तूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होना है मगर नेताओं के दल बदलने का सिलसिला जोरों पर है।

कभी धुर विरोधी रहे लालू-नीतीश को देख लें या फिर जीतनराम मांझी के राजग में शामिल होने की बात हो। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे वैसे-वैसे कई पार्टियों के नेताओं की रंग बदलने की राजनीति दिखाई पड़ेगी।

शुभम सोनी, इछावर (मप्र)

 

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