वर्तमान समय में वैश्वीकरण और निजीकरण के चलते तमाम परिभाषाएं और मान्यताएं बदल गई हैं। समाज में नई चुनौतियों के कारण रोज अलग समस्याएं आ रही हैं और उनका समाधान सामान्य तरीके से होना असंभव है। भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय हमारे संविधान की धुरी है। सामाजिक न्याय की अवधारणा हमारे लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि हमारी एकता अनेकता के आधार पर टिकी है और यहां ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए चिंतित है। तमाम लोग ऐसे हैं जो न्यूनतम मानवीय सुविधाओं के अभाव में जीवनयापन कर रहे हैं। जस्टिस कृष्णा अय्यर (सामाजिक न्याय: सूर्यास्त या भोर) ने सही कहा था कि भारत वर्ष में क्षेत्रवाद, जातिवाद, भाषावाद आदि ऐसी मिसाइलें हैं जो हमारे सामाजिक न्याय रूपी जहाज को मार कर गिराती रहती हैं। सामाजिक न्याय समाज के कमजोर वर्गों के प्रति बेहतर बर्ताव की मांग कर सकता है, लेकिन यह सिर्फ समाज में व्याप्त असंतुलन को दूर करने के लिए है, न कि किसी को प्रताड़ित करने या किसी के प्रति अन्याय के लिए।
सामाजिक न्याय का अर्थ एक ऐसे समूह से है जो मनुष्य को मनुष्य होने के नाते पवित्रता का घर मानता है, उसे पूर्ण मानवता प्राप्त करने में सहायता देता है और उन्हें एक दूसरे के प्रति प्यार, सम्मान, दया, सहिष्णुता के साथ बर्ताव करने और पूरे विश्व को एक अद्भुत कृति मानते हुए उसका सम्मानपूर्वक और पर्यावरणीय एवं नैतिक दायित्वों के प्रति सजग रहते हुए उपयोग की अनुमति देता है। लेकिन आज भी समाज में कुरीतियां वैसे ही मौजूद हैं जैसे पहले थीं। समाज के दुर्लभ वर्गों को ऊंचा उठाए बिना, दलितों पर अत्याचार को रोके बिना, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों का विकास किए बिना सामाजिक न्याय की स्थापना नहीं हो सकती।
सामाजिक न्याय का अभिप्राय है कि मनुष्य मनुष्य के बीच सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेद न माना जाए, हरेक व्यक्ति को समुचित विकास के समान अवसर उपलब्ध हों, किसी भी व्यक्ति का किसी भी रूप मे शोषण न हो, समाज के सभी की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हों, आर्थिक सत्ता चंद हाथों में केंद्रित न हो, समाज का कमजोर वर्ग अपने को असहाय महसूस न करे। समाज के सामान्य आदमी की भलाई के लिए जो नियम बनाए गए हैं, वे ज्यादातर किताबों की शोभा बढ़ा रहे हैं, ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सामान्य आदमी में सामाजिक जागृति का अभाव है और दूसरा, समाज के उन लोगों में, जिनका स्तर बहुत ऊपर है और जिन्हें समाज के अन्य वर्गों को आगे बढ़ाने में मदद करनी चाहिए, उनमें नैतिक शिक्षा का अभाव है। सामाजिक इंसाफ कब होगा, इसका इंतजार आज भी समाज के बहुत वर्गों को है।
’संतोष कुमार, बठिंडा

