भद्र समाज की अभद्रता! इस वाक्य में निहित विरोधाभास पर न जाएं, यह आज के आधुनिक, प्रगतिशील ‘भद्र’ भारतीय समाज का सच है। पर कड़वा नहीं कम से कम, उन महानुभावों के लिए जिनका उल्लेख यहां किया जा रहा है। वे तो इस अनुच्छेद को पढ़ कर भी वही भद्दी हंसी हंसेंगे और वह भी ठहाके मार कर और एक बार फिर किसी के कानों में गरम पिघला सीसा-सा घुल जाएगा।
हमारा भद्र भारतीय समाज, जो हर कदम पर संस्कारों, संस्कृति, सभ्यता की दुहाई देता है और आजकल भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में भी प्रचारित किया जाता है तो संभवत: इस कड़ी में प्रगतिशील विचारधारा को भी जोड़ देना चाहिए। लेकिन क्या वस्तुस्थिति यही है? नहीं।
वस्तुस्थिति की एक झलक पाने के लिए किसी भी कार्यालय में झांक कर देख लें- सरकारी से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक। आपको वहां भद्र पुरुषगण अपनी सारी सभ्यता, संस्कार और प्रगतिशील विचारधारा की चाशनी में डुबो कर जैसी अभद्र टिप्पणी करते मिलेंगे वह ‘भद्र समाज की अभद्रता’ का अर्थ अक्षरश: समझा देगा। और सबके केंद्र में स्पष्टत: होती है- स्त्री।
वही स्त्रियां जो उनके साथ दिन के आठ घंटे एक ही स्थान पर कार्य करती हैं, उनके साथ, उनकी सहयोगी, अधिकारी या अधीनस्थ के रूप में। और स्त्री तो भोगनीय है ही पुरुषों के लिए- शरीर नहीं तो भावनाएं तो सहज सुलभ हैं ही! जो कुछ वे उनके शरीर के साथ प्रत्यक्षत: नहीं कर पाते, इस सभ्य समाज के भद्र नागरिक होने के कारण, वह सब वे अपने शब्दों से कर डालते हैं। और हां, हर बार यह छुपा कर नहीं किया जाता, स्त्रियों को सुना कर भी, आखिरकार उनका मनोबल भी तो तोड़ना है!
वह कैसे उनके समकक्ष या उनसे ऊपर पहुंच सकती है! प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध करने से पहले स्त्रियों को यह बखूबी समझा दिया जाता है कि रावण से भिड़ कर जाओगी भी कहां? घर पर रामचंद्र बैठे हैं, एक आरोप और तुम गृहविहीन! यह है विरोधाभास। जिसके साथ गलत हो वही इस डर से चुप रहे कि उसे ही गलत माना जाएगा। यह है हमारे समाज का सच। पढ़े-लिखे कुलीन सभ्य लोगों का सच!
इन भद्र पुरुषों के लिए यह समझना नितांत आवश्यक है कि प्रकृति ने स्त्री को उनके भोगार्थ नहीं बल्कि समाज के कल्याणार्थ रचा है। उनके साथ तो उन्हें सहचरी का पद पुरुषों की दया से नहीं मिला बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त है। उन्हें समझना होगा कि आज सीता और मंदोदरी को अपने जीवन उद्देश्य की प्राप्ति के लिए न रामचंद्र, न रावण के आश्रय की आवश्यकता है। हां आवश्यकता है तो एक ऐसे समाज की जो उनका सम्मान करे। सारे स्त्री अधिकारों से जुड़े विवादों का हल इसी में निहित है।
’श्वेता शर्मा, कोलकाता</p>
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